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शिकंजा : भ्रष्टाचार के आरोपी अभियंता को राहत देने से दिल्ली हाईकोर्ट का इनकार 

Fri, 31 Dec 2021 06:03 AM IST
दुष्यंत शर्मा विजय सिंघल, नई दिल्ली

सार

कहा, आरोपी व उसके परिवार के पास से जांच के दौरान 67 लाख 38 हजार रुपये नगद बरामद हुए। निचली अदालत के अभियोग तय करने के फैसले में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है।
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दिल्ली हाईकोर्ट - फोटो : ANI
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विस्तार
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हाई कोर्ट ने अनाधिकृत निर्माण करवाने व भ्रष्टाचार में लिप्त दक्षिणी दिल्ली एमसीडी के सहायक अभियंता अनिल कुमार को राहत प्रदान करने से इंकार कर दिया। अदालत ने उसके खिलाफ तय अभियोग को रद्द करने के संबंध में दायर याचिका खारिज करते हुए कहा कि ट्रायल कोर्ट ने पेश सक्ष्यों व तथ्यों के आधार पर ही आरोपी को प्रथम दृष्टया दोषी मानते हुए अभियोग तय किए है। इसके अलावा स्वयं एमसीडी ने उसके भ्रष्ट आचरण को देखते हुए मामला दर्ज करवाया है।

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न्यायमूर्ति चन्द्र धारी सिंह ने अपने फैसले में कहा कि आरोपी व उसके परिवार के पास से जांच के दौरान 67 लाख 38 हजार रुपये नगद बरामद किए है। अदालत ने कहा तर्कों के साथ-साथ रिकॉर्ड विशेष रूप से चार्जशीट, आरोप पर आदेश, और जांच के दौरान की गई वसूली के प्रकाश में इस न्यायालय को याचिकाकर्ता के वकील द्वारा दिए गए तर्कों में कोई बल नहीं मिला। न ही निचली अदालत के निष्कर्ष में कोई स्पष्ट त्रुटि मिलती है, क्योंकि प्रथम दृष्टया आरोपी के खिलाफ मामला बनता है।

उन्होंने कहा इस न्यायालय का यह भी मत है कि मामले में उपलब्ध साक्ष्यों को देखते हुए उक्त धाराओं के अंतर्गत अपराध की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। इस प्रकार बैटन ट्रायल कोर्ट के समक्ष है जिसे अंतिम तर्कों के साथ आगे बढ़ना है क्योंकि मुकदमे की योग्यता की जांच करने के लिए परीक्षण पूरा हो गया है। ऐसे में वे उपरोक्त साक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए यह न्यायालय ट्रायल कोर्ट के निर्णय में हस्तक्षेप करना उचित नहीं समझते। 
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पेश तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए और कानून के प्रावधानों का अध्ययन करने के बाद इस न्यायालय को तत्काल याचिका में कोई योग्यता नहीं मिलती है, धारा 482 के अधिकार क्षेत्र के प्रयोग का मामला नहीं बनता है और इसलिए वे याचिका को खारिज करते हैं।

अदालत ने कहा इसके अलावा वर्तमान मामले में एमसीडी ने स्वयं एफआईआर दर्ज करके आपराधिक कार्यवाही शुरू की है,साथ ही संबंधित लोक सेवकों पर मुकदमा चलाने की मंजूरी याचिकाकर्ता के वरिष्ठ अधिकारी द्वारा दी गई है।पेश मामले के अनुसार 14  सितंबर 1998 को हाईकोर्ट ने दक्षिणी दिल्ली के इलाकों में अनाधिकृत निर्माण पर निर्माण कर्ता के अलावा संबंधित विभागों के अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई का निर्देश दिया था। इसके बाद एमसीडी आयुक्त ऐसे अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई का निर्देश दिया था। इसी कड़ी में छतरपुर इलाके में तीन बिल्डिगों के खिलाफ कार्रवाई करते हुए याची अनिल कुमार के अलावा अन्य के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज किया गया।

सीबीआई ने जांच में पाया कि एमसीडी अधिकारी एक फ्लोर के दो लाख रुपये वसूलते थे। बिल्डिरों व अधिकारियों के भ्रष्ट आचरण के चलते ही इलाके में अवैध निर्माण चल रहा था। सीबीआई ने आरोपी व उसके परिवार के बैंक लॉकर से 67 लाख 38 हजार रुपये की नगदी बरामद की थी।

बचाव पक्ष के अधिवक्ता दयान कृष्णन ने तर्क रखा कि उनका मुवक्किल अवैध निर्माण के लिए जिम्मेदार नहीं है और ही जहां निर्माण हुआ वह क्षेत्र उनके मुवक्किल के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता था। वहीं सीबीआई ने तर्क रखा कि आरोपी ने अन्य अधिकारियों की फर्जी निरीक्षण रिपोर्ट पर हस्ताक्षर किए और बरामद नगदी से स्पष्ट है कि आरोपी भ्रष्टाचार में लिप्त रहा है। 

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