जानकारी के मुताबिक ऑनलाइन दवाओं को बिक्री को लेकर जहीर अहमद ने पीआईएल दायर की थी जिसमें यह दलील दी गई थी कि लाखों दवाइयां इंटरनेट के जरिए बिना किसी नियम-कानून के रोजोना बेची जा रही हैं। इससे मरीज की जान को खतरा है। साथ ही साथ डॉक्टरों के लिए भी बड़ी परेशानी खड़ी हो गई है।
याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट को बताया कि बिना डॉक्टरी परामर्श के ऑनलाइन दवाइयों की बिक्री नियमों के विरुद्ध है। याचिकाकर्ता ने कोर्ट का ध्यानआकर्षित करते हुए यह भी बताया कि इंटरनेट पर कई ऐसी दवाएं बिना रोकटोक के बेची जा रही है जो केवल डॉक्टर के प्रेस्क्रिप्शन के बाद ही मिलती है। कानून भी इसकी इजाजत नहीं देता। याचिकाकर्ता ने ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक एक्ट, 1940 और फार्मेसी एक्ट, 1948 के तहत इसे बिल्कुल खिलाफ बताया। इसके अलावा याचिका में सरकार की मंशा पर भी सवाल खड़ा किया गया है।
याचिका के मुताबिक दवाइयों की ऑनलाइन सेल को लेकर सरकार कुछ भी ठोस कदम नहीं उठा रही है। ऑनलाइन दवा-विक्रेता बिना लाइसेंस के दवाइयां बेच रहे हैं। पीआईएल में बताया गया है कि सरकार इस बात से भली-भांति वाकिफ है। याचिकाकर्ता ने यह भी बताने की कोशिश की है कि इतना कुछ तब हो रहा है जब सितंबर में केंद्र सरकार ने ऑनलाइन दवाइयों की बिक्री के संबंध में नियम का ड्राफ्ट तैयार कर दिया था। इस नियम के आधार पर दवाओं की बिक्री रजिस्टर्ड ई-फॉर्मेसी पोर्टल के जरिए ही की जा सकती है।
ज्ञात हो भारत में ऑनलाइन दवा बाजार की कमाई तकरीबन 780 अरब रुपये से अधिक की है। ऐसे में तमाम ऑनलाइन कंपनियां इस पर भी अपना अधिपत्य जमाने की जद्दोजहद में हैं। वहीं, दूसरी तरफ इस कदम से स्टोर वाले दवा-विक्रेताओं की मुश्किलें बढ़ी हैं। पिछले कई सालों से दवा-विक्रेताओं का समूह ऑनलाइन सेल के खिलाफ प्रदर्शन और हड़तालें भी कर चुका है।