उच्च न्यायालय ने द्वारका जिले के पुलिसकर्मियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने और कार्रवाई का निर्देश देने वाली निचली अदालत के फैसले पर रोक लगा दी है।
इतना ही नहीं अदालत ने मामले में आरोपियों को नोटिस जारी का जवाब मांगा है। पुलिस ने तर्क रखा कि ईमानदार अधिकारियों के खिलाफ मामला दर्ज करने का कोई भी निर्देश अपराध से ग्रस्त जिले में पुलिस के लिए काम करना न केवल मुश्किल होगा बल्कि यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत उन अधिकारियों के अधिकारों का भी उल्लंघन है।
न्यायमूर्ति योगेश खन्ना ने दिल्ली पुलिस के वकील की दलीलें सुनने के बाद प्राथमिकी दर्ज करने के आदेश पर रोक लगा दी। अदालत ने मामले की सुनवाई 15 सितंबर तय की है।
अतिरिक्त डीसीपी द्वारका जिले ने 24 मार्च 2022 को अतिरिक्त सत्र न्यायालय द्वारका कोर्ट द्वारा पारित आदेश को चुनौती दी है। पुलिस की और से पेश अतिरिक्त स्थायी वकील अवि सिंह ने तर्क दिया कि निचली अदालत के न्यायाधीश ने तीन अलग-अलग मामलों में प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दिया है। संबंधित जज ने एक सामान्य आदेश के माध्यम से सभी अभियुक्तों को उनके पूर्ववृत्त वसूली संबंधी अपराध में उनकी संलिप्तता के दायरे पर विचार किए बिना जमानत दे दी।
अदालत ने उनके तर्क सुनने के बाद माना कि आरोपियों को 19 अक्तूबर 2021 को पहली बार रिमांड पर भेजा गया और उन्होंने संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष पुलिसकर्मियों पर किसी भी प्रकार का आरोप नहीं लगाया।
इसके बाद कई बार उनकी पेशी हुई और कभी भी प्रताड़ना या किसी अन्य प्रकार का आरोप नहीं लगाया गया। आरोपियों ने पहली बार 9 मार्च 22 को जमानत पर सुनवाई के दौरान अपनी हत्या का प्रयास सहित कई आरोप लगाए।