अदालत ने वर्ष 2020 के दंगों को एक राजनीतिक दल की करतूत बताने और आपराधिक मामलों में अकेले मुस्लिम समुदाय के सदस्यों को फंसाने संबंधी आरोपी के वकील के बयानों पर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने उनके इस बयान को बेहद गैर जिम्मेदाराना और स्पष्ट रूप से झूठा बताया है। इतना ही नहीं अदालत ने आरोपी आरिफ को जमानत देने से इंकार कर दिया।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश वीरेंद्र भट ने आरोपी आरिफ की और से पेश अधिवक्ता महमूद प्राचा के तर्को पर आपत्ति जताते हुए कहा कि निश्चित रूप से उचित नहीं है। अधिवक्ता महमूद प्राचा ने अदालत के समक्ष तर्क रखा था कि दंगे वास्तव में सांप्रदायिक नहीं थे और अदालत के आदेश की प्रति के अनुसार सीएए-एनआरसी के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध को पटरी पर लाने के लिए कुछ राजनीतिक निहित स्वार्थों के कारण हुई थी।
प्राचा ने आलोक तिवारी की कथित तौर पर हत्या के आरोपी आरिफ की जमानत के लिए बहस करते हुए यह तर्क रखे। अधिवक्ता ने दलील दी कि दंगों के बाद केवल मुस्लिम समुदाय से जुड़े लोगों को ही पुलिस ने निशाना बनाया और आदेश के अनुसार झूठे आपराधिक मामलों में आक्षेप लगाए गए। अदालत ने उनके तर्को को अस्वीकार करते हुए कहा कि प्राचा ने अपने दावे को पुख्ता करने के लिए रिकॉर्ड पर कोई सामग्री पेश नहीं कि दंगे सांप्रदायिक प्रकृति के नहीं थे या किसी राजनीतिक दल की करतूत थी।
अदालत ने कहा प्राचा स्वयं वकील है, जो अब यह कहते हुए पूरी दिल्ली पुलिस को साम्प्रदायिक ब्रश से चित्रित कर रहे है कि दंगों से संबंधित आपराधिक मामलों को केवल मुस्लिम समुदाय के सदस्यों पर ही फंसाया गया है। वकील का बयान न केवल बेहद गैरजिम्मेदाराना है बल्कि स्पष्ट रूप से झूठा भी है।
अदालत ने कहा कि उन्होंने दंगों से जुड़े मामलों से निपटने के दौरान देखा है कि दोनों समुदायों के सदस्यों को आरोपी के रूप में दोषी ठहराया गया है और पुलिस ने उन्हें चार्जशीट किया है। उन्होंने कहा, कुछ मामलों में यह देखा गया है कि हिंदू समुदाय से संबंधित गवाह हैं जो एक ही समुदाय से संबंधित आरोपियों के खिलाफ उद्धृत हैं और मुस्लिम समुदाय से संबंधित गवाहों ने एक ही समुदाय से संबंधित आरोपियों के खिलाफ है।
अदालत ने कहा कि पुलिस ने अपना काम अत्यंत निष्ठा के साथ किया है और निश्चित रूप से सांप्रदायिक आधार पर नहीं, उन्होंने कहा कि जांच के दौरान कुछ खामियां हुई हैं लेकिन यहां तक कि वे इस बात का जरा भी संकेत नहीं देते कि जांच निष्पक्ष और निष्पक्ष नहीं थी या यह सांप्रदायिक आधार पर थी। अदालत ने अधिवक्ता प्राचा को गैर-जिम्मेदाराना, बिना बुलाए और स्पष्ट रूप से झूठे तर्क देने से बाज आने की सलाह दी।
उन्होंने कहा कि दंगों के मामले बेहद गंभीर और संवेदनशील प्रकृति के होते हैं और इसके लिए पेशेवर तरीके से और बिना किसी सांप्रदायिक आरोप के पेश होने की जरूरत होती है। अदालत ने आरोपी आरिफ की जमानत अर्जी को भी खारिज करते हुए कहा कि इस बात की पूरी संभावना है कि वह चश्मदीद गवाह से संपर्क कर सकता है या डरा सकता है या रिहा होने पर फरार होने की कोशिश कर सकता है।