मराठा स्वाभिमान को एक नई ऊंचाई देने वाले छत्रपति शिवाजी महाराज के वंशज आज भी अपने गृह क्षेत्र कोल्हापुर में बहुत आदरणीय माने जाते हैं। जनता के बीच आज भी उनको वही आदर और सम्मान प्राप्त है, जो कभी शिवाजी के जमाने में हुआ करता था।
छत्रपति शिवाजी के वंशज सांसद श्रीमंत युवराज छत्रपति संभाजी महाराज ने अमर उजाला को बताया कि महाराष्ट्र के कई राजनीतिक दल आज भी शिवाजी के नाम पर अपनी राजनीति चला रहे हैं।
उन्होंने कहा कि यह अच्छी बात है। मराठों के गौरवशाली इतिहास आगे बढ़ाने के लिए अगर शिवाजी को आदर्श बना कर पेश किया जाता है तो युवाओं को प्रेरित करने की दृष्टि से यह बेहतर कदम साबित हो सकता है।
हाल ही में एक पुस्तक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को शिवाजी की तरह पेश किया गया था। संभाजी महाराज का कहना है कि एक ऐतिहासिक आदर्श को इस तरह से व्याख्यायित नहीं किया जाना चाहिए। इससे उन लोगों की भावनाएं आहत होती हैं जो शिवाजी को आदर्श मानते हैं।
मध्यप्रदेश में एक जगह पर शिवाजी की मूर्ति को हटाए जाने के विवाद पर संभाजी महाराज ने कहा कि प्रशासन का तरीका बेहद अनुचित और लोगों को तकलीफ पहुंचाने वाला था।
अगर ट्रैफिक को आसान बनाने के लिए मूर्ति को हटाना आवश्यक था, तो वे इसका कत्तई विरोध नहीं करते, लेकिन इसके लिए एक सही प्रक्रिया का इस्तेमाल कर एक अनुचित विवाद से बचा जा सकता था।
उन्होंने उम्मीद जाहिर की कि भविष्य में किसी भी क्षेत्र का प्रशासन किसी भी महापुरुष की मूर्ति को लगाने या हटाने की प्रक्रिया में जनता की भावनाओं का आदर रखेगा और संवेदनशीलता के साथ कार्य करेगा।
संभाजी महाराज ने कहा कि छत्रपति शिवाजी किसी वर्ग विशेष के प्रिय नहीं थे, जैसा कि बहुजन समाज पार्टी जैसे राजनीतिक दल करते हैं। उनकी कोशिश एक समतामूलक समाज को स्थापित करने की थी। उनकी राजनीति को देश और समाज में एकता स्थापित करने के लिए उपयोग में लाया जाना चाहिए।
यही कारण है कि अब वे शिवाजी के विचारों को मध्य-पश्चिम भारत के साथ-साथ उत्तर भारत में भी फैलाना चाहते हैं। इसके लिए अब वे एक विशेष मिशन पर काम कर रहे हैं।
महान मराठा योद्धा शिवाजी महाराज का जन्म आज ही के दिन 19 फरवरी 1630 में हुआ था। मुगलों की सत्ता को चुनौती देकर उसमें विजयी होते हुए वर्ष 1674 में उन्होंने अपने नाम से शासन करना शुरू कर दिया था।
उनके शासनकाल को मराठा स्वाभिमान के आदर्श के रूप में याद किया जाता है। लेकिन दुर्भाग्य से इस महान नेता की महज 50 वर्ष की अल्पायु में तीन अप्रैल 1680 में मौत हो गई। उनके देहावसान के बाद संभाजी ने उनके शासन को आगे बढ़ाया था।