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छत्रपति शिवाजी का परचम फिर फहराना चाहते हैं उनके वंशज, बनाई ये रणनीति

Wed, 19 Feb 2020 03:34 PM IST
Harendra Chaudhary अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

  • शिवाजी महाराज की 13वीं पीढ़ी कर रही खेतीबाड़ी
  • संभाजी हैं सांसद तो उनके छोटे भाई मालुज जी करते हैं शिक्ष्ण संस्थाओं की देखभाल
  • शिवाजी की राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए कर रहे प्रयास
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Shrimant Yuvraj Sambha Ji Maharaj - फोटो : AmarUjala
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विस्तार
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मराठा स्वाभिमान को एक नई ऊंचाई देने वाले छत्रपति शिवाजी महाराज के वंशज आज भी अपने गृह क्षेत्र कोल्हापुर में बहुत आदरणीय माने जाते हैं। जनता के बीच आज भी उनको वही आदर और सम्मान प्राप्त है, जो कभी शिवाजी के जमाने में हुआ करता था।

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शिवाजी की 13वीं पीढ़ी अब राजशाही का आनंद भले ही नहीं ले रही हो, लेकिन अपने जनहित के कार्यों के कारण वे आज भी मराठाओं के लिए आदर्श बने हुए हैं।

जनता के बीच उनके लिए इस सम्मान को देखते हुए ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी जनसभा में इस परिवार को विशेष सम्मान दिया और बाद में उनके परिवार के एक सदस्य संभाजी महाराज को राज्यसभा में नामित किया। शिवाजी की 13वीं पीढ़ी के एक अन्य वंशज महाराज सतारा उदयन राजे भोंसले दो बार एनसीपी से लोकसभा सदस्य रहे।

लेकिन इस बार 2019 में विधानसभा चुनाव से पहले वे लोकसभा से इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल हो गए और भाजपा के टिकट पर लोकसभा का उपचुनाव लड़े। लेकिन उन्हें हराने के लिए मराठा क्षत्रप एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार ने भारी बारिश में सातारा में एक विशाल रैली की और उदयन राजे चुनाव हार गए।
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छत्रपति शिवाजी की 12वीं पीढ़ी के साहूजी महाराज को आज भी लोग उनकी पूर्व उपाधि ‘अधिपति’ से नवाजते हैं। साहूजी महाराज के बड़े पुत्र (शिवाजी की 13वीं पीढ़ी) संभाजी इस समय नामित राज्यसभा सदस्य हैं। उनके छोटे भाई मालुज शिक्षण संस्थाओं का संचालन करते हैं जिसे शिवाजी के परिवार ने उनकी कीर्ति को आगे बढ़ाने के लिए बना रखा है।

इन शिक्षण संस्थाओं में प्रारंभिक शिक्षा से लेकर इंजीनियरिंग और प्रबंधन तक की उच्च शिक्षा दी जाती है। इसके आलावा एक ट्रस्ट के मध्यम से परिवार खेती-बाड़ी करता है जिसकी आय ट्रस्ट को ही जाती है।  

उनके छोटे भाई मालुज जी महाराज ने इसके पूर्व कांग्रेस के टिकट पर कोल्हापुर से अपनी किस्मत आजमाई थी, लेकिन उन्हें इसमें सफलता नहीं मिली थी। वहीं संभाजी ने 2009 में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के टिकट पर कोल्हापुर से ही चुनाव लड़ा था। उन्हें भी सफलता नहीं मिली थी।

शिवाजी के नाम पर

छत्रपति शिवाजी के वंशज सांसद श्रीमंत युवराज छत्रपति संभाजी महाराज ने अमर उजाला को बताया कि महाराष्ट्र के कई राजनीतिक दल आज भी शिवाजी के नाम पर अपनी राजनीति चला रहे हैं।

उन्होंने कहा कि यह अच्छी बात है। मराठों के गौरवशाली इतिहास आगे बढ़ाने के लिए अगर शिवाजी को आदर्श बना कर पेश किया जाता है तो युवाओं को प्रेरित करने की दृष्टि से यह बेहतर कदम साबित हो सकता है।
 
हाल ही में एक पुस्तक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को शिवाजी की तरह पेश किया गया था। संभाजी महाराज का कहना है कि एक ऐतिहासिक आदर्श को इस तरह से व्याख्यायित नहीं किया जाना चाहिए। इससे उन लोगों की भावनाएं आहत होती हैं जो शिवाजी को आदर्श मानते हैं।
 
मध्यप्रदेश में एक जगह पर शिवाजी की मूर्ति को हटाए जाने के विवाद पर संभाजी महाराज ने कहा कि प्रशासन का तरीका बेहद अनुचित और लोगों को तकलीफ पहुंचाने वाला था।

अगर ट्रैफिक को आसान बनाने के लिए मूर्ति को हटाना आवश्यक था, तो वे इसका कत्तई विरोध नहीं करते, लेकिन इसके लिए एक सही प्रक्रिया का इस्तेमाल कर एक अनुचित विवाद से बचा जा सकता था।

उन्होंने उम्मीद जाहिर की कि भविष्य में किसी भी क्षेत्र का प्रशासन किसी भी महापुरुष की मूर्ति को लगाने या हटाने की प्रक्रिया में जनता की भावनाओं का आदर रखेगा और संवेदनशीलता के साथ कार्य करेगा।

क्या चाहते हैं वंशज

संभाजी महाराज ने कहा कि छत्रपति शिवाजी किसी वर्ग विशेष के प्रिय नहीं थे, जैसा कि बहुजन समाज पार्टी जैसे राजनीतिक दल करते हैं। उनकी कोशिश एक समतामूलक समाज को स्थापित करने की थी। उनकी राजनीति को देश और समाज में एकता स्थापित करने के लिए उपयोग में लाया जाना चाहिए।

यही कारण है कि अब वे शिवाजी के विचारों को मध्य-पश्चिम भारत के साथ-साथ उत्तर भारत में भी फैलाना चाहते हैं। इसके लिए अब वे एक विशेष मिशन पर काम कर रहे हैं।

इस दिन हुआ था शिवाजी महाराज का जन्म

महान मराठा योद्धा शिवाजी महाराज का जन्म आज ही के दिन 19 फरवरी 1630 में हुआ था। मुगलों की सत्ता को चुनौती देकर उसमें विजयी होते हुए वर्ष 1674 में उन्होंने अपने नाम से शासन करना शुरू कर दिया था।

उनके शासनकाल को मराठा स्वाभिमान के आदर्श के रूप में याद किया जाता है। लेकिन दुर्भाग्य से इस महान नेता की महज 50 वर्ष की अल्पायु में तीन अप्रैल 1680 में मौत हो गई। उनके देहावसान के बाद संभाजी ने उनके शासन को आगे बढ़ाया था।  

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