आईटीओ स्थित दिल्ली का सबसे बड़ा कब्रिस्तान पूरी तरह से भर गया है। वहां शव दफनाने की जगह नहीं बची है। अस्पतालों से जब-जब आईटीओ कब्रिस्तान फोन जाता है तो वहां से इनकार कर दिया जाता है। इसकी वजह से लोगों को द्वारका और मंगोलपुरी स्थित कब्रिस्तान जाना पड़ रहा है। एंबुलेंस को 30-30 किलोमीटर दूर का रास्ता तय करना पड़ता है।
लोकनायक अस्पताल के एक अधिकारी ने बताया कि दूर तक जाने की वजह से एंबुलेंस व्यस्त रहती है जिसकी वजह से दूसरे परिवारों को इंतजार करना पड़ रहा है। वहीं अस्पताल के निदेशक डॉ. सुरेश कुमार ने कहा कि इस तरह की परेशानी के बारे में उन्हें जानकारी मिली है। इसे लेकर वे विभागीय अधिकारियों से भी संपर्क कर रहे हैं। जब जदीद कब्रिस्तान अहले इस्लाम जाकर ‘अमर उजाला’ ने वहां देखरेख करने वाले शमीम अहमद से बात की तो उन्होंने बताया कि मार्च 2020 से दिसंबर 2021 तक वहां करीब 1480 शवों को दफनाया गया।
कब्रिस्तान का करीब 50 फीसदी हिस्सा कोविड से पहले ही भर गया था। बाकी 50 फीसदी हिस्सा बीते दो वर्षों में भर चुका है। करीब सात एकड़ में कब्रिस्तान है और वहां अब जगह नहीं है। सामान्य तौर पर शव को दफनाने की गहराई तीन फीट होती है, लेकिन कोरोना मरीज की मौत हुई होती है तो उसको छह फीट गहराई में दफनाया जाता है। लोकनायक सहित मध्य और नई दिल्ली जिले के लगभग सभी अस्पताल इन दिनों ऐसे ही संकट का सामना कर रहे हैं।
शमीम ने बताया कि दक्षिण पूर्वी जिले में सनलाइट कॉलोनी के पास कब्रिस्तान की जमीन है। वहां अगर अनुमति मिल जाए तो शवों को दफनाया जा सकता है लेकिन वहां के स्थानीय निवासी आपत्ति जता रहे हैं। इस बारे में कब्रिस्तान प्रबंधन की ओर से भी दिल्ली सरकार को सूचित किया जा चुका है। शमीम का कहना है कि पिछले चार-पांच दिन से उनके पास अस्पतालों से फोन आ रहे हैं लेकिन वे मदद नहीं कर पा रहे हैं।
एंबुलेंस, जेसीबी, पीपीई किट का खर्चा अलग से
तुर्कमान गेट निवासी शोएब ने बताया कि एंबुलेंस को अलग से खर्चा देना पड़ता है और कब्रिस्तान पहुंचने के बाद पहले जेसीबी और फिर पीपीई किट पहनने तक का चार्ज भी परिजनों से लिया जा रहा है। उन्होंने करीब छह हजार रुपये खर्च किए थे। शोएब ने कहा कि जिस परिवार के पास रुपये का इंतजाम न हो तो वह अपने परिजन को अंतिम विदा तक नहीं दे पाएगा। उन्होंने कहा कि सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए।
नजदीकी अस्पतालों से आ रही कॉल:
शमीम ने बताया कि पिछले एक सप्ताह से रोजाना उनके पास लोकनायक अस्पताल, सफदरजंग, एम्स, होली फैमिली सरीखे नजदीकी अस्पतालों से हर दिन तीन से चार फोन कॉल आती हैं। जगह न होने से इन्हें दफनाने से उनको इनकार करना पड़ रहा है। इस संबंध में बीते शुक्रवार को दिल्ली नगर निगम की एक टीम भी कब्रिस्तान आई थी और कमेटी ने उनसे भी जमीनी हालात के बारे में पूरी जानकारी दी। संभव है कि कोई रास्ता निकल आए।
केस एक
तुर्कमान गेट निवासी शोएब का परिवार शोक में है। दो सप्ताह पहले ही उनके पिता की तबीयत खराब होने की वजह लोकनायक अस्पताल में भर्ती कराया गया था। वह कोरोना संक्रमित पाए गए। तीन दिन पहले उनकी मौत हो गई। शोएब ने बताया कि चार घंटे इंतजार करने के बाद उन्हें एंबुलेंस मिली और शव दफनाने के लिए मंगोलपुरी स्थित कब्रिस्तान जाना पड़ा जो अस्पताल से करीब 28.5 किलोमीटर दूर है। उन्होंने बताया कि आईटीओ स्थित कब्रिस्तान में जगह नहीं होने की वजह से उन्हें वहां जाना पड़ा।
केस दो
कृष्णा नगर निवासी सादिक की मां मुमताज की मौत भी कोरोना संक्रमण की वजह से हुई। पिछले सप्ताह शुक्रवार को अस्पताल से उन्हें सूचना मिली। इसके बाद वह भाई के साथ अस्पताल पहुंचे। वहां पता चला कि उन्हें एंबुलेंस से द्वारका स्थित कब्रिस्तान जाना होगा। जो अस्पताल से 31.8 किलोमीटर दूर था।