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G-20 Summit : लंगूर के कटआउट से खेल रहे बंदर, पौधों पर मंडरा रहे कबूतर, युक्ति साबित हो रही बेअसर

Wed, 30 Aug 2023 05:51 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली

सार

अधिकारियों का कहना है कि बंदरों के लिए जंगल के अंदर ही व्यवस्था की गई है। लोगों से इनको नियत जगह पर खाना देने को कहा जा रहा है लेकिन वह फुटपाथ पर ही खाना रख रहे हैं। मंगलवार को भी मार्ग पर बंदर बाहर बैठे हुए थे, जिन्हें केला, टमाटर, आम व खाने का अन्य सामान लोगों ने दिया।
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monkey - फोटो : फाइल फोटो
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विस्तार
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लंगूर के कटआउट बंदरों का खिलौना बन गए हैं, जबकि इनको लगाने का मकसद जी-20 के दौरान बंदरों को सड़क, फुटपाथ के साथ सरकारी दफ्तरों से दूर रखना है। वहीं, लंगूर की आवाज भी ज्यादा कारगर नहीं साबित हुई है। 

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दूसरी तरफ कनॉट प्लेस से कबूतरों को हटाने के लिए लगाए गए पौधों भी असरदार नहीं हैं। मंगलवार को काफी संख्या में पक्षी यहां मंडराते दिखे। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह का तरीका कारगर नहीं हो सकता। लंबे समय में बनी आदतें एक दिन में नहीं बदल सकतीं। विशेषज्ञ बताते हैं कि बंदर की दोनों प्रजातियों का जंगल में परिवेश नजदीक है। लंगूर पत्तियां खाते हैं, जबकि बंदर पत्तियां व फल खाते हैं। जंगल में दोनों के बीच कभी संघर्ष नहीं होता। बंदर भगाने का जो चलन हुआ, उसमें लंगूर की लंबाई व उसका प्रशिक्षण काम करता है। लंगूर के साथ लाठी लेकर बंदर की तरफ बढ़ने से यह भाग जाता है, बावजूद इसके बंदर ज्यादा आक्रामक है। आवाज निकालने या कटआउट लगाने से लंगूर में डर पैदा करना संभव नहीं है।

उधर, अधिकारियों का कहना है कि बंदरों के लिए जंगल के अंदर ही व्यवस्था की गई है। लोगों से इनको नियत जगह पर खाना देने को कहा जा रहा है लेकिन वह फुटपाथ पर ही खाना रख रहे हैं। मंगलवार को भी मार्ग पर बंदर बाहर बैठे हुए थे, जिन्हें केला, टमाटर, आम व खाने का अन्य सामान लोगों ने दिया।
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सड़क से दफ्तरों तक बंदर ही बंदर : राम मनोहर लोहिया के पास बंदरों को भगाने के लिए जगह-जगह लंगूर के कटआउट रखे गए थे, मंगलवार को बंदर इन्हें पकड़कर झूलते दिखते। साइमन बोलिवर मार्ग पर भी बंदर सड़क पर आकर मस्ती करते दिखे। बुद्धा गार्डन में भी बंदरों का जमावड़ा था। कई जगहों पर इन बंदरों को कुछ लोग खाना खिलाते हुए भी दिखाई दिए। शास्त्री भवन, कांस्टीट्यूशनल क्लब, आईएनएस, सेना भवन सहित दूसरे दफ्तर भी इनसे सुरक्षित नहीं है। अक्सर यह वाहनों को नुकसान पहुंचाते हैं। कई बार सड़क पर चलने वालों से सामान भी छीन लेते हैं।

उजड़ा आशियाना, थमा नहीं कबूतरों का आना
शिखर सम्मेलन की तैयारियों में कनाॅट प्लेस से कबूतरों को हटाने के लिए उनके दाने-पानी का ठिकाना उजाड़ दिया गया है। इसकी जगह पर पौधे लगाए गए हैं। एक फव्वारा भी लगाया गया है। साथ ही कबूतरों के दाना डालने व उनके लिए पीने के पानी के बर्तन रखने की जगह नहीं बची है। बावजूद इसके कबूतरों का आना मंगलवार को भी जारी रहा। विशेषज्ञ बताते हैं कि पक्षियों की आदत लंबे अनुभव के बाद पड़ती है। ऐसे में अचानक से इसे हटाने से ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा।

इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है कि लंगूर की आवाज से बंदरों को भगाना संभव है। इनके चलने का एक पैटर्न होता है। मंगलवार व शनिवार को यह रिहायशी क्षेत्र में ज्यादा सक्रिय रहते हैं। अगर इन पर नियंत्रण करना है तो पहले इनके मूवमेंट पैटर्न को देखना पड़ेगा। इसके आधार पर जरूरी इंतजाम करने होंगे। वहीं, सड़कों व फुटपाथ पर खाना देने वालों को सख्ती से रोकना पड़ेगा।
-डॉ. फैय्याज खुदसर, वन्य जीव विशेषज्ञ

बंदरों को भगाने व पक्षियों को हटाने की सरकारी एजेंसियों की कोशिश कामयाब नहीं होने जा रही है। अगर हकीकत में यह काम करना है तो पहले इनका बर्थ कंट्रोल करना पड़ेगा। खाने का सामान देने पर बंदिश लगाकर यह संभव हो सकता है। वजह यह कि यह आश्वस्त होने से कि भोजन पर्याप्त नहीं है, वह प्रजनन सीमित कर देंगे। वहीं, दिल्ली में इसके लिए एक विस्तृत अध्ययन करने की जरूरत है। पक्षियों व बंदरों की आदत एक दिन में नहीं बदली जा सकती। इसके लिए वैज्ञानिक आधार पर तैयार सुनियोजित योजना पर काम करना पड़ेगा।
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-प्रो. (डॉ.) अनिल के छंगाणी, पर्यावरणविद व वन्य जीव विशेषज्ञ

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