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World TB Day : नई तकनीक सीबी-नाट की उपलब्धता से टीबी मरीज की पहचान आसान, मुक्ति अभियान हुआ मजबूत

Mon, 24 Mar 2025 03:28 AM IST
दुष्यंत शर्मा राकेश शर्मा, नई दिल्ली

सार

विशेषज्ञों का कहना है कि सीबी-नाट एक आधुनिक जांच की तकनीक है। इसमें उपलब्ध होने वाली दवा व दूसरे उपकरण से सटीक परिणाम मिलते हैं।
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फेफड़ों की बीमारी, टीबी - फोटो : Adobe Stock
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विस्तार
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कार्ट्रिज-आधारित न्यूक्लिक एसिड एम्पलीफिकेशन टेस्ट (सीबी-नाट) की उपलब्धता बढ़ने से टीबी मुक्त भारत अभियान मजबूत हुआ है। दिल्ली में पिछले 100 दिनों में 31 हजार से ज्यादा मरीजों की पहचान हुई है। 

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विशेषज्ञों का कहना है कि सीबी-नाट एक आधुनिक जांच की तकनीक है। इसमें उपलब्ध होने वाली दवा व दूसरे उपकरण से सटीक परिणाम मिलते हैं। केंद्र सरकार ने साल 2025 में देश को टीबी मुक्त करने का लक्ष्य रखा है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए दिल्ली में 100 दिन का अभियान चलाया गया।

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इस अभियान के दौरान दिल्ली के भीड़भाड़ वाले क्षेत्र, रैन बसेरे, वृद्ध आश्रम, स्मोकर, स्लम बस्ती सहित अन्य जगहों पर लोगों की सीबी-नाट से जांच हुई। इसमें दो घंटे में रिपोर्ट मिल पाती है। मरीज की रिपोर्ट पॉजिटिव मिलते ही तुरंत इलाज शुरू हो जाता है। छह माह तक इलाज चलने पर मरीज के ठीक होने की संभावना बढ़ जाती है। 

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महरौली स्थित लाला राम सरूप टीबी अस्पताल की डॉ. नीता ने बताया, अस्पताल में हर साल करीब 10 हजार मरीज पंजीकृत होते हैं। बीते 100 दिनों में चले विशेष अभियान के दौरान सामान्य दिनों के मुकाबले करीब 20 फीसदी मरीज ज्यादा मिले। 
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इलाज में देरी से हो सकती है मौत 
टीबी माइक्रो बैक्टीरिया ट्यूबरक्लॉज नाम के एक बैक्टीरिया से फैलता है। टीबी का असर फेफड़ों के साथ शरीर के दूसरे हिस्सों पर भी हो सकता है। इसमें गुर्दे, रीढ की हड्डी, दिमाग सहित प्रमुख अंग हैं। यदि इस बीमारी का सही समय पर इलाज न किया जाए तो इंसान की मौत भी हो सकती है।

बढ़ रहे हैं मामले 
निजी लैब के सीईओ डॉ. आकार कपूर ने कहा, अज्ञानता और कुपोषण के कारण बच्चों में भी यह रोग तेजी से बढ़ रहा है। संस्थान में पिछले छह महीनों में हुई जांच में 21 फीसदी बाल चिकित्सा मामलों (16 वर्ष तक) और लगभग 14 फीसदी वयस्क मामलों में सूक्ष्मजीवविज्ञानी रूप से टीबी की पुष्टि की गई है, जिसमें पल्मोनरी और अतिरिक्त पल्मोनरी दोनों प्रकार की टीबी शामिल हैं। इसी प्रकार, लेटेंट टीबी के लिए आईजीआरए परीक्षण में बाल चिकित्सा आयु वर्ग (16 वर्ष तक) में 23 फीसदी पॉजिटिव परिणाम मिले, जबकि वयस्कों में यह आंकड़ा 43 फीसदी रहा।

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