एम्स के नेफ्रोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. एसके अग्रवाल का कहना है कि प्रत्यारोपण के बाद रोगी को सीएनवी और बीके वायरस जकड़ लेता है। इस कारण प्रत्यारोपण के बाद भी मरीज का जीवन संक्रमण से घिरा रहता है। इसलिए प्रत्यारोपण के बाद भी इन रोगियों को पूर्ण रूप से आराम मिलने का दावा करना ठीक नहीं।
एम्स ने शोध के बाद नेफ्रोपैथी पर फोकस किया है। हैपेटाइटिस सी, बी और प्रत्यारोपण के बाद होने वाले संक्रमण को पहले से ही डॉक्टर ध्यान में रख उपचार कर रहे हैं। एम्स में इस समय कुछ मरीज ऐसे भी हैं, जिन्हें दो से तीन बार प्रत्यारोपण कराना पड़ा है।
वहीं, एक मरीज ऐसा भी है, जिसने 40 साल पहले एम्स में ही प्रत्यारोपण कराया था। डॉक्टरों का मानना है कि प्रत्यारोपण के बाद की स्थितियों को लेकर एम्स ने कई शोध किए। इनके परिणाम आने के बाद एम्स ने इलाज प्रक्रिया को और मजबूत बनाया।
निजी अस्पतालों में सबसे ज्यादा प्रत्यारोपण
डॉ. एसके अग्रवाल ने बताया कि देश में गुर्दा प्रत्यारोपण विशेषज्ञ बेहद कम हैं, लेकिन सालाना छह हजार से ज्यादा प्रत्यारोपण किए जा रहे हैं। 80 फीसदी प्रत्यारोपण निजी अस्पतालों में किए जा रहे हैं। इनमें से करीब 50 फीसदी से ज्यादा मामले प्रत्यारोपण के बाद संक्रमण की चपेट में आ रहे हैं। अंदेशा है कि संक्रमण ग्रस्त मरीजों का ये आंकड़ा और भी ज्यादा हो सकता है, लेकिन निजी अस्पतालों में करीब आधे प्रत्यारोपण विदेशी नागरिकों के किए जाते हैं। इसकी वजह भारत में प्रत्यारोपण और देशों की तुलना में सस्ता होना है। प्रत्यारोपण के बाद ये नागरिक वापस अपने देश लौट जाते हैं। इनकी निगरानी बाद में नहीं हो पाती।