झारखंड पवेलियन में हर चरण को विस्तार से समझा रहीं
ज्योति सिंह
नई दिल्ली। तसर सिल्क की चमक, उबलते कोकून की हल्की भाप, करघे की खट-खट और उन सबके बीच काम करतीं ग्रामीण महिलाएं। यह दृश्य किसी डॉक्यूमेंट्री का हिस्सा नहीं, बल्कि आईआईटीएफ का सबसे खरा और जिंदा अनुभव है। तसर का महीन धागा जब कोकून से निकलता है तो उसमें सिर्फ रेशम नहीं। सैकड़ों महिलाओं की मेहनत, जंगलों की खुशबू और ग्रामीण कारीगरों की पीढ़ियों का हुनर बसा होता है। यही धागा आज दिल्ली से न्यूयॉर्क तक की फैशन लाइनों में अपनी चमक छोड़ रहा है। यह दृश्य आप भारत मंडपम में आयोजित भारत अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेला के झारखंड पवेलियन में देख सकते हैं।
देश के कुल तसर उत्पादन का 70 प्रतिशत अकेले झारखंड से होता है। यह उपलब्धि सिर्फ राज्य की प्राकृतिक संपदा और कौशल का प्रमाण नहीं, बल्कि महिलाओं के नेतृत्व में उभरती एक मजबूत ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कहानी भी है। पवेलियन का मुख्य आकर्षण वह लाइव डेमो है, जहां तसर कोकून से रेशम धागा निकालने की पारंपरिक प्रक्रिया दिखाई जा रही है। प्रशिक्षित महिला कारीगर कोकून उबालने से लेकर धागा तैयार करने तक हर चरण को विस्तार से समझाती हैं।
तसर उत्पादन के 50-60 फीसदी कार्यों में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी है। वहीं, स्टॉल संचालक ने बताया कि झारखंड में आज 100 कोकून संरक्षण केंद्र और 40 पूर्ण-सुविधायुक्त परियोजना केंद्र संचालित हैं। 2001 में 90 मीट्रिक टन कच्चे रेशम का उत्पादन बढ़कर 2024-25 में एक हजार 363 मीट्रिक टन तक पहुंच गया है, जिसने झारखंड को देश की तसर राजधानी के रूप में स्थापित कर दिया है। झारखंड पवेलियन तसर की चमक, महिलाओं की मेहनत और ग्रामीण झारखंड की तरक्की की प्रेरक गाथा साथ-साथ आगे बढ़ती दिखाई देती है।