वर्ष 1996 से शुरू होकर 1999 तक का भाजपा की केंद्रीय राजनीति व प्रदेश में उसके गठबंधन का स्वर्णिम काल फरीदाबाद लोकसभा सीट के लिए वरदान साबित हुआ। लहर और गठबंधन में ही यहां तीन बार भाजपा का सांसद बना।
प्रदेश में दो बार बंसीलाल के नेतृत्व वाली हरियाणा विकास पार्टी व एक बार इनेलो का साथ इस सीट पर भाजपा के लिए काफी मुफीद रहा। इस दौरान इस सीट पर जातीय समीकरण भी भाजपा प्रत्याशी का फेवर कर गए।
इस बार नरेंद्र मोदी के भाजपा का प्राइम मिनिस्टर इन वेटिंग होना वोटरों को पसंद आता है या नहीं, यह तो समय ही बताएगा, लेकिन जाट मतदाताओं के अलावा अन्य वोट बैंक पर सेंधमारी किए बिना भाजपा की राह आसान नहीं दिखती।
क्या इस बार भी मिलेगी जीत?
पहले गुड़गांव व अब फरीदाबाद सीट पर आजादी के बाद से अब तक कुल 15 बार हुए लोकसभा चुनाव हुए हैं। जिसमें दस बार कांग्रेस का पंजा ही भारी पड़ा है।
इसके अलावा तीन भाजपा, एक बार निर्दलीय व एक बार बीएलडी ने यहां पर विजय श्री प्राप्त की है। भाजपा ने तीन बार बीजेपी के टिकट से सांसद रहे चुके रामचंद्र बैंदा को छोड़कर तिगांव के मौजूदा विधायक व पूर्व प्रदेश अध्यक्ष कृष्णपाल गुर्जर पर दाव खेला है।
देखना यह है कि क्या इस सीट पर अटल की तरह मोदी लहर का कोई फायदा मिलेगा।
अटल व इनेलो का साथ जीत बना था कारण
प्रदेश में क्षेत्रीय दलों से भाजपा के गठबंधन ने इस सीट पर पार्टी को माइलेज दिया। वर्ष 1996 व 1998 में बंसीलाल की हविपा प्रदेश में मजबूत थी, भाजपा से इस चुनाव में उसका गठबंधन था, जिसमें फरीदाबाद सीट भाजपा के हिस्से आई और बैंदा ने यहां से पहली जीत दर्ज की।
वर्ष 1999 के चुनाव में सरकार गिरने के बाद भाजपा व अटल बिहारी वाजपेयी को मिल रहे समर्थन तथा इनेलो का साथ इस सीट पर कमल को खिला गया।
2004 से इंडिया शाइनिंग रास नहीं आई
2004 में इस सीट पर भाजपा के प्रत्याशी की बहुत बुरी गत हुई। इस लोकसभा चुनाव में बीजेपी तीसरे नंबर की पार्टी साबित हुई।
यहां पर प्रत्याशी रामचंद्र बैंदा को महज 20.33 प्रतिशत वोट मिले। वहीं 2009 के चुनाव में एक बार बीजेपी ने फिर से रामचंद्र बैंदा पर दांव खेला। लेकिन यहां से सफलता नहीं मिली। बैंदा को 30.35 प्रतिशत मत मिले और वह दूसरे नंबर पर रहे।