नोएडा-ग्रेटर नोएडा में फ्लैट खरीदारों के आशियाने पर संकट के बीज 2009 में ही बो दिए गए थे। जमीन की कुल कीमत का मात्र 10 फीसदी जमा कर सभी को बिल्डर बनने का मौका दे दिया गया।
वह बाकी किस्त का भुगतान करने की स्थिति में हैं भी या नहीं, इसका ख्याल नहीं किया गया, जिसका नतीजा अब सामने है। उत्तर प्रदेश सरकार ने 25 अक्तूबर 2009 को एक शासनादेश जारी किया गया, जिसमें नोएडा-ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण को निर्देश दिया गया कि जमीन की कुल कीमत का 10 फीसदी लेकर आवंटन कर दिया जाए।
बाकी किस्तें आठ साल की 16 छमाही किस्त में लेने का निर्देश मिला। इससे पहले 30 फीसदी रकम का भुगतान करने का प्रावधान था।
इसी आदेश में बिल्डरों के लिए एक और दरियादिली दिखाई गई, कि उनसे आवंटन के दो साल तक सिर्फ ब्याज (मोरोटोरियम) लिया जाएगा। इस हिसाब से दस साल तक का मौका बिल्डरों को मिल गया।
ऐसा माना जा रहा है, कि 2009 से 2012 के बीच जितने ग्रुप हाउसिंग प्लॉट आवंटित हुए थे उतने तो 2009 से पहले 30 वर्षों में भी नहीं हुए।
जानकार मानते बताते हैं कि इस आदेश के कारण बिल्डरों की बाढ़ आ गई। नोएडा फेज तीन, नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेसवे और ग्रेटर नोएडा वेस्ट के ज्यादातर आवंटन इसी दौरान हुए। बिल्डरों ने जैसे-तैसे 10 फीसदी रकम जुटाकर प्राधिकरण से जमीन खरीद ली।
प्राधिकरण और निबंधन विभाग से प्लॉट की रजिस्ट्री हो गई। बिल्डरों ने प्रोजेक्ट लांच कर खरीदारों के फ्लैट बुक कर लिए। फ्लैट खरीदारों को दिखाने के लिए साइट पर कुछ काम भी शुरू करा दिए और निवेशकों के पैसों को अपनी ब्रांडिंग और शानो-शौकत पर खर्च कर दिया।
साथ ही कुछ पैसे से प्राधिकरण से और जमीन खरीद ली। इस धुन में बिल्डर प्राधिकरण की किस्त देना भी भूल गए। एक-दो किस्तें देने के बाद डिफॉल्टर होने लगे।
डिफॉल्टर होते ही उन पर ब्याज की दोहरी मार पड़ी। मात्र छह साल में सिर्फ नोएडा प्राधिकरण से आवंटित जमीन का ही बिल्डरों पर 25 हजार करोड़ रुपये बकाया खड़ा हो गया।
जानकार मानते हैं कि रियल एस्टेट में आई मंदी ने कोढ़ में खाज का काम किया। अगर सब कुछ ठीक चल रहा होता तो खरीदारों को मौजूदा हालात से न जूझना पड़ता। मंदी के कारण फ्लैट बिकने भी कम हो गए।
प्राधिकरण की किस्त बकाया होने और डिफॉल्ट होने की स्थिति में बैंकों ने भी कर्ज देना कम कर दिया। नई शुरुआत करने वाले बिल्डर स्थिति को संभाल नहीं सके। इसी का नतीजा है कि तमाम बिल्डर अब खरीदारों को फ्लैट बनाकर नहीं दे पा रहे।
कुछ बिल्डरों ने निर्माण पूरे कर लिए, लेकिन प्राधिकरण का बकाया न जमा करने के कारण कंपलीशन नहीं ले पा रहे, जिसकी भरपाई खरीदारों को करनी पड़ रही है।