वैलेंटाइन डे की खुमारी रविवार को मतदान पर भारी पड़ी। युवा (18-35 वर्ष) वोट डालने के लिए नहीं निकले। युवा बूथों पर कम, मॉल-मल्टीप्लेक्स, रेस्टोरेंट और सड़कों पर ज्यादा नजर आए।
गाजियाबाद में 11 लाख 77 हजार 576 मतदाता हैं। अनुमान के मुताबिक, इनमें से करीब छह लाख युवा मतदाता हैं, जिनमें से करीब 20 हजार युवाओं ने वोटिंग की। वोट डालने में 40 साल से ज्यादा उम्र केलोग आगे रहे।
संडे होने से भी लोग घरों से नहीं निकले। जानकारों का मानना है कि वर्किंग डे में लोग घरों से निकलते हैं। चुनाव हो तो ऑफिस जाने से पहले वोट डालने से गुरेज नहीं करते। यही वजह रही कि बूथ पर लाइनें तक नहीं लग पाईं।
मेयर के बचे 18 माह के कार्यकाल ने बिगाड़ा चुनाव का हाल
उपचुनाव के 18 महीने के कार्यकाल ने भी मतदान का हाल बिगाड़ दिया। कम कार्यकाल केचलते ज्यादातर लोगों की चुनाव में रुचि नहीं थी।
मतदान दिवस पर ज्यादातर लोगों ने घर पर ही छुट्टी मनाई। शहर में इस बार चुनाव जैसा माहौल भी नहीं बन पाया। शायद यह शहर के इतिहास का सबसे उदासीन चुनाव था, जिसमें दोपहर तक कई केंद्रों पर 10-15 वोट ही पड़े थे।
मतदान प्रतिशत घटा..नेताओं का दिल बैठा
सुबह 8 बजे मतदान शुरू हुआ तो प्रत्याशियों के चेहरे खिले हुए थे। दिन चढ़ने के साथ मतदान की रफ्तार नहीं बढ़ी तो प्रत्याशियों का ही नहीं राजनीतिक दलों के नेताओं का भी दिल बैठने लगा।
लोग घरों से न निकले तो राजनीतिक दलों का गणित बिगड़ने लगा। पार्टियों ने अपने युवा संगठन के कार्यकर्ताओं को मतदाताओं को बूथों तक लाने की जिम्मा सौंपा। इसके बावजूद भी प्रत्याशी मतदान का प्रतिशत नहीं बढ़वा सके।
दोपहर दो बजे तक शहर में सिर्फ 12.69 फीसदी मतदान हुआ था। मतदाताओं की यह प्रतिक्रिया प्रत्याशियों और राजनीतिक दलों की उम्मीदों के विपरीत था।
मतदाता घरों से न निकले तो राजनगर में भाजपा ने अपने युवा मोर्चा के कार्यकर्ताओं की टोली को कालोनियों में उतारा। ये टोलियां घर-घर पहुंचीं और लोगों से वोट डालने का आग्रह किया। इसी तरह सपा के कार्यकर्ता मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में काम करते दिखायी दिए।
मतदान की घटी रफ्तार निश्चित रूप से परिणामों को भी प्रभावित करेगी। ऐसे में प्रत्याशियों के दिलों की धड़कने बढ़ी हुई हैं। हालांकि सभी प्रत्याशी अपने पक्ष में परिणाम आने का दावा कर रहे हैं।
लिस्ट से कटा नाम, सैकड़ों नहीं कर सके मतदान
प्रत्याशी नए, मुद्दे नए, चुनाव में टीम भी नयी, पर शहर की ‘तकदीर’ पुरानी मतदाता सूची पर लिखी गई। 2012 से 2016 तक कई बदलाव आ चुके, हजारों पुराने वोटर जा चुके और नए आकर बस गए, लेकिन सूची में कोई संशोधन नहीं किया गया।
पुराने मतदाताओं के नाम काट दिए गए, और नए मतदाता अपना नाम वोटर लिस्ट में जुड़वा नहीं पाए। वोट प्रतिशत घटने की बड़ी वजह यही रही, लेकिन मतदाताओं को भी समझने में देर नहीं लगी कि ऐसा हुआ क्यों है।
पुराना मेयर चुनाव 2012 में नयी मतदाता सूची पर हुआ था। इस सूची में शामिल हजारों युवतियां शादी के बाद दूसरे शहरों में जाकर बस गई हैं। हजारों युवा नौकरी के लिए दूसरे शहरों का रुख कर चुके। किराए पर रहने वाले हजारों परिवार कालोनियां बदल चुके हैं।