देरी से मिला न्याय, न्याय नहीं होता। कुछ ऐसा ही करीब 18 वर्ष पूर्व हुए उपहार अग्निकांड मामले में हुआ है। उपहार दुर्घटना पीड़ित एसोसिएशन अध्यक्ष एवं पीड़ित नीलम कृष्णमूर्ति व अन्य को धमकाने, जान से मारने की धमकियां देने, महिला के सम्मान को ठेस पहुंचाने व लोकसेवक के आदेश की अवज्ञा करने से जुड़ा मामला करीब आठ वर्ष से हाईकोर्ट में लंबित रहा। पिछले आठ वर्ष से मामले में एक बार भी जिरह नहीं हुई और जब हुई भी तो मात्र आधा घंटा। आखिर अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।
उपहार अग्निकांड से जुड़े मुख्य मामले की सुनवाई के दौरान आरोपियों ने पीड़ित को अदालत में आने से रोकने के लिए उनको धमकाया व उनके सम्मान के प्रति आपत्तिजनक टिप्पणियां भी की थी। आखिर एसोसिएशन के सदस्यों की याचिका पर पटियाला हाउस स्थित अदालत ने 28 जून 2007 को सुशील अंसल, गोपाल अंसल के अलावा उनके कर्मचारी प्रवीण शर्मा व दीपक कथपालियां को आरोपी बना दिया था।
अदालत ने इन सभी के खिलाफ समन जारी कर तलब कर लिया था। उधर अंसल बंधुओं की याचिका पर हाईकोर्ट ने 3 जुलाई 2007 को एक तरफा सुनवाई में निचली अदालत की सुनवाई पर रोक लगा दी थी।
हाईकोर्ट ने इस याचिका पर न्यायमूर्ति इन्द्रमीत कौर, हीमा कोहली, सुनीता गुप्ता, वीके शैली, एके पाठक, एसपी गर्ग, वीके गुप्ता सहित करीब नौ जजों के पास सुनवाई के लिए करीब 40 बार याचिका लगी। हर बार किसी न किसी कारण से सुनवाई टलती रही। नतीजा कुछ नहीं निकला।
आखिर अब सुनवाई तीन मार्च को पुन: न्यायमूर्ति एसपी गर्ग के समक्ष मामले की सुनवाई लगी। न्यायमूर्ति ने दोनों पक्षों को सुना और मात्र आधा घंटे चली सुनवाई के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।
उपहार सिनेमा में हुए अग्निकांड में 59 दर्शक मारे गए थे और करीब 100 से ज्यादा घायल हुए थे