पति से ब्लड ग्रुप नहीं मिलने की वजह से रेखा चाहकर भी पति को किडनी डोनेट नहीं कर पा रही थी। वहीं, एम्स में ही बलजीत कौर भी अपने पति के लिए किडनी की तलाश कर रही थी।
इलाज कर रहे डॉक्टरों ने दोनों परिवारों को मिलवाया और संयोग से ब्लड ग्रुप भी मिल गए और रेखा की किडनी बलजीत के पति को और बलजीत की किडनी रेखा के पति को ट्रांसप्लांट कर दी गई।
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में स्वैप किडनी ट्रांसप्लांट का यह पहला मामला है। एम्स प्रशासन चाहता है कि स्वैप किडनी ट्रांसप्लांट को बढ़ावा मिले।
आईं बेइम्तहां दिक्कतें लेकिन...
जिस मरीज के प्रत्यारोपण होता है और जिसे अंगदान करना होता है उसे संबंधित राज्य से आवासीय प्रमाण-पत्र लाना होता है। इससे पहले मरीज को अपने साथ एम्स से जारी किया गया प्रमाणपत्र भी साथ रखना होता है। अंग प्रत्यारोपण संबंधी एम्स का पत्र होने के बाद भी दोनों मरीजों को अपने-अपने राज्य से अनुमति लेने में काफी समय लग गया।
अनुमति के लिए एम्स के डॉक्टर को भी संबंधित राज्य में उस अधिकारी से बात करनी पड़ी जो मरीज और डोनर को आवासीय प्रमाण-पत्र जारी करता है। दरअसल, वर्ष-2013 में मानव अंग प्रतिरोपण अधिनियम में स्वैप अधिनियम को भी शामिल किया गया। लेकिन इस संशोधन की जानकारी कई राज्यों में उस अधिकारी के पास नहीं है जिसके द्वारा प्रमाणपत्र जारी किया जाता है।
ऐसे मिले थे दोनों परिवार
गाजियाबाद के मोठा गांव के रहने वाले संत कुमार और उत्तराखंड के हरिद्वार जिले के मिटीबेरी गांव निवासी जगपाल सिंह को किडनी खराब होने के बाद एम्स में भर्ती कराया गया। संत कुमार की पत्नी रेखा और जगपाल की पत्नी बलजीत अपने-अपने पति को किडनी देने के लिए तैयार थीं, लेकिन इन दोनों का अपने पति से ब्लड ग्रुप मेल नहीं खा रहा था। इसकी वजह से किडनी ट्रांसप्लांट संभव नहीं था।
एम्स में मरीजों का इलाज कर रहे डॉ. संदीप अग्रवाल और डॉ. संजय कुमार अग्रवाल ने मरीज के परिजनों को बताया कि कैसे दोनों की जरूरत को पूरा किया जा सकता है। डॉक्टर की पहल पर दोनों परिवार आपस में मिले और काउंसलिंग के बाद दोनों महिलाएं एक-दूसरे के पति को किडनी देने के लिए तैयार हो गईं।
अभी 5 लाख को किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत
किडनी निकालने और प्रत्यारोपण करने के लिए एम्स के नेफ्रोलॉजी, सर्जरी और एनेस्थीसिया विभाग के डॉक्टरों को मिलकार दो टीमें बनाई गई। दोनों टीम में चिकित्सकों सहित कुल 24 लोग शामिल थे। 2 जून को एक ही साथ दोनों महिलाओं की किडनी निकाली गई और फिर फौरन दोनों किडनी को ट्रांसप्लांट किया गया। इस पूरी प्रक्रिया में करीब छह घंटे लगे। सर्जरी पर करीब 25 से 30 हजार रुपये का खर्च आया।
एम्स के चिकित्सकों ने बताया कि भारत में प्रति वर्ष साढ़े चार लाख से पांच लाख लोगों को किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत होती है। लेकिन महज छह से साढ़े छह हजार मरीजों का ही किडनी ट्रांसप्लांट हो पाता है। 95 फीसदी किडनी ट्रांसप्लांट जिंदा व्यक्ति के किडनी दान करने की वजह से होता है जबकि पांच फीसदी किडनी ही मृतक अथवा ब्रेन डेड मरीज से ली जाती है।