दिल्ली में छिड़ी सत्ता की जंग के लिए आम आदमी पार्टी और उसके संयोजक अरविंद केजरीवाल की भूमिका सबसे अहम हैं। दिल्ली में आज जो भी राजनीतिक संकट चल रहा है वह कहीं न कहीं केजरीवाल की ही देन है।
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49 दिनों तक सत्ता चलाने के बाद मैदान छोड़कर भागे अरविंद केजरीवाल ने पार्टी बनाने से लेकर लोकसभा चुनाव लड़ने तक अपनी ही मर्जी से काम किये हैं, जिसका खामियाजा न सिर्फ पार्टी को भुगतना पड़ा बल्कि आम आदमी का भरोसा भी टूटा।
दिल्ली की जनता से माफी मांगने वाले केजरीवाल ने वैसे तो कई गलतियां की है। आगे की स्लाइड में जानिए केजरी की पांच सबसे बड़ी गलतियां:
कांग्रेस के साथ बनाई सरकार
पिछले साल दिल्ली में हुए विधानसभा चुनावों में चमत्कारिक जीत हासिल करने वाली आम आदमी पार्टी के संयोजक केजरीवाल ने सत्ता के लालच में आकर अपनी सबसे बड़ी कसम तोड़ दी।
चुनाव जीतने से पहले ही केजरीवाल ने अपने बच्चों कसम खाकर ऐलान किया था कि वह बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही पार्टियों के साथ मिलकर कभी भी सरकार नहीं बनाएंगे, लेकिन बाद में वह मुकर गए और कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बना ली।
केजरीवाल ने दिल्ली की जनता का इस्तेमाल भी अपने राजनीतिक सुख के लिए किया। सरकार बनाते वक्त तो जनता की राय ली लेकिन इस्तीफा देने से पहले उसी जनता को भूल गए।
नियमों को न मानने की जिद
दिल्ली सत्ता हासिल करने के बाद अरविंद केजरीवाल ने नियमों और संविधान की भी अनदेखी शुरू की दी। पार्टी के विधायक टोपियां पहनकर विधानसभा में पहुंच गए तो खुद अरविंद केजरीवाल ने अपने ही फैसले थोपने की कोशिश की।
जनलोकपाल बिल पास कराने के मामले में भी केजरीवाल ने संवैधानिक प्रक्रिया से अलग हटकर बिल पास कराने की कोशिश की।
दरअसल नियमों के मुताबिक गृह मंत्रालय की मंजूरी के बगैर जनलोकपाल बिल को विधानसभा में पेश नहीं किया जा सकता था। इस मामले में केंद्रीय विधि और न्याय मंत्रालय ने भी यही बात कही थी, लेकिन केजरीवाल अपनी जिद पर अड़े रहे। जिसका नतीजा यह हुआ कि बिल गिर गया।
रेल भवन पर धरना
चुनाव के बाद अपने वादे से मुकरते हुए सरकारी बंगला लेने के मामले में भी केजरीवाल की जमकर आलोचना हुई। यही नहीं केजरीवाल के बेलगाम सिपाहियों ने भी उनकी जमकर फजीहत कराई।
'आप' सरकार में मंत्री रहे सोमनाथ भारती ने खिड़की एक्टेंशन पर विदेशी महिलाओं पर सेक्स रैकट चलाने का आरोप लगाते हुए दिल्ली पुलिस को रेड डालने का आदेश दिया और जब ऐसा नहीं हुआ तो वह पुलिस अधिकारियों से ही भिड़ गए। यही नहीं, उन्होंने खुद विदेशी महिलाओं के घरों में घुसकर बवाल किया।
इस मामले में केजरीवाल ने कोई एक्शन लेने के बजाय पुलिसकर्मियों को सस्पेंड करने और दिल्ली पुलिस पर सरकार का हक होने की मांग करते हुए अपनी पूरी कैबिनेट के साथ रेल भवन पर धरना शुरू कर दिया।
जनता की अनदेखी कर सरकार से इस्तीफा
दिल्ली में सरकार बनाने से पहले जनता की राय लेने वाले अरविंद केजरीवाल इस्तीफा देते वक्त जनता को नजरअंदाज कर गए और यही उनकी सबसे बड़ी खामी बन गई।
जनलोकपाल बिल पास न होने से नाराज केजरीवाल ने 14 फरवरी को अपना इस्तीफा उपराज्यपाल को सौंप दिया और साथ ही विधानसभा भंग करने की भी मांग की। इसके बाद ही दिल्ली में राष्ट्रपति शासन लग गया।
केजरीवाल सरकार के इस्तीफे से जहां उनकी किरकिरी हुई और इसका नतीजा लोकसभा चुनावों में साफ नजर आया।
बनारस के चक्कर में गवां दी सत्ता!
दिल्ली में 'आप' की सरकार बनने और फिर इस्तीफा देने के पीछे एक मात्र कारण लोकसभा चुनाव को माना जा रहा है। दरअसल केजरीवाल का प्लान ये था कि दिल्ली की सत्ता में रहते हुए उनका चुनाव प्रचार अभियान ठीक से नहीं चल पाएगा, इसलिए उन्होंने सरकार से इस्तीफा दे दिया।
इस्तीफा देने की इस गलती के बाद केजरीवाल ने गलतियों का पहाड़ खड़ा कर दिया। 434 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने वाली आम आदमी पार्टी का सारा जोर केजरीवाल की बनारस सीट पर रहा और इसका खामियाजा यह हुआ कि 421 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई।
लोकसभा चुनावों में 'आप' को महज 4 सीटें मिलीं और केजरीवाल खुद भी चुनाव हार गए। चुनावी महासमर में केजरीवाल की एक गलती ने पूरी पार्टी की लुटिया डुबो दी।
इनके अलावा भी केजरीवाल ने एक के बाद एक कई ऐसी गलतियां कीं जिनका खामियाजा पार्टी को भी भुगतना पड़ा। रामलीला मैदान में विधानसभा सत्र बुलाने की जिद हो या फिर सरकारी बंगला न लेने का वादा करके मुकर जाना।
चुनाव के दौरान भ्रष्ट नेताओं की सूची जारी करके भी केजरीवाल ने अपनी मुसीबतें बढ़ाईं। इस मामले में केजरीवाल को फिलहाल 2 दिन की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया।
केजरीवाल के इन फैसलों से पार्टी के भीतर भी फूट पड़नी शुरू हो गई है।