दिल्ली-एनसीआर का प्रदूषण कम करने के लिए सिर्फ ऑड-इवन और डीजल टैक्सी पर पाबंदी काफी नहीं है। विशेषज्ञों की मानें तो प्रदूषण पर नियंत्रण लगाने के लिए सार्वजनिक परिवहन प्रणाली, टाउन प्लानिंग, अरावली के सरंक्षण, औद्योगिक नीति और कंस्ट्रक्शन को लेकर सरकार को अपनी नीतियों में परिवर्तन करना होगा।
दूषण के स्रोत पर वार करने के साथ ही मौजूदा स्तर को भी कम करने के लिए काम करना होगा। विशेषज्ञों के मुताबिक इन पांच चीजों पर काम करके एनसीआर की आबोहवा को काफी हद तक शुद्ध बनाया जा सकता है। पेश है संवाददाता शाहनवाज आलम की रिपोर्ट -
सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था
एमिटी यूनिवर्सिटी के पर्यावरण विभाग के प्रमुख डॉ. कुशाग्र राजेंद्र कहते हैं कि गुड़गांव ही नहीं हरियाणा और एनसीआर के दूसरे शहरों में सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था नाम मात्र की है। ऐसे में लोग ऑटो या खुद की कार का सहारा लेते हैं। एक डीजल कार सात पेट्रोल कार के बराबर प्रदूषण फैलाती है। गुड़गांव, फरीदाबाद में सार्वजनिक परिवहन का बेहद अभाव है। भीड़ भाड़ और औद्योगिक क्षेत्रों में हजारों की आवाजाही के बावजूद यहां कोई भी बस या मेट्रो की सुविधा नहीं है। गुड़गांव के सबसे अधिक घनत्व वाले पुराने शहर और औद्योगिक क्षेत्रों में आज तक मेट्रो नहीं पहुंची है।
गलत टाउन प्लानिंग
नगर निगम के पूर्व चीफ टाउन प्लानर एससी कुश का कहना है कि बेहतर टाउन प्लानिंग करके प्रदूषण को काफी हद तक कम कर सकते हैं। हर सेक्टर में अच्छी मार्केट और दिनचर्या की जरूरतों के सामान मिलें। सेक्टरों के बीच कनेक्टीविटी के लिए सार्वजनिक परिवहन मौजूद हो। सड़कें चौड़ी हों और रास्ते ऐसे बनें, जिनसे दूरी कम से कम हो, तो प्रदूषण पर लगाम लगेगी। लोगों की जरूरत की चीजों की उपलब्धता कम दूरी पर होगी तो गाड़ियों का उपयोग कम होगा। साइकिल ट्रैक और पैदल यात्री के लिए ट्रैक हो तो लोग इसका इस्तेमाल करेंगे। जो भी नई कॉलोनी या सेक्टर बने, उसमें चार फीसदी कॉमर्शियल एरिया, 51 फीसदी रेजीडेंशियल एरिया, 20 फीसदी सड़कों के लिए और 15 फीसदी पार्क के लिए होने चाहिए, लेकिन इसका पालन नहीं होता है। अगर यह नॉम्स पूरा कर लिया जाए तो वहां प्रदूषण कम रहेगा।
अरावली का सरंक्षण
पर्यावरणविद चेतन अग्रवाल का कहना है कि अरावली एनसीआर के लिए फेफड़े का काम करता है, लेकिन इसके लिए ठोस नीति बनाने की जरूरत है। इसका दायरा बढ़ाया जाए। जहां-जहां जंगल वीरान हो गए है, वहां पर पेड़ लगाए जाएं। शहरों में हरियाली और ग्रीन बेल्ट को विकसित किया जाए, जिससे बेहतर तरीके से प्रदूषण को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी। लेकिन इसके लिए केंद्र और राज्य सरकार को ठोस नीति बनानी होगी।
औद्योगिक नीति
एनसीआर के फरीदाबाद, नोएडा, गाजियाबाद और गुड़गांव औद्योगिक क्षेत्र हैं। इनमें बड़ी संख्या में पारंपरिक उद्योग पारंपरिक ईंधन से चलते हैं। अब समय इको फ्रेंडली मशीनें और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत का उपयोग करने का है। जैसे कोयले और डीजल से चलने वाले उद्योग की जगह बिजली, पीएनजी या सोलर का इस्तेमाल किया जाए। फरीदाबाद में करीब 150 उद्योग पीएनजी से चल रहे हैं। दूसरे शहरों में भी इस तरह के इंतजाम से औद्योगिक प्रदूषण कम हो सकता है। एनसीआर के आसपास के ईंट और प्रदूषण करने वाली कंपनियों पर लगाम लगाने की जरूरत है।
बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन
आरटीआई कार्यकर्ता हरिंद्र धींगड़ा का कहना है कि गुड़गांव और एनसीआर के क्षेत्रों में फैले प्रदूषण में हाईराइज बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन का अहम रोल है। सीमेंट, बालू और अन्य कंस्ट्रक्शन मैटेरियल से महीन पार्टिकल हवा में उड़ते हैं। गुड़गांव के सेक्टर-56 पर हो रहे लगातार कंस्ट्रक्शन से इतना प्रदूषण हो रहा था कि इस पर लगाम लगाने के लिए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने पाबंदी भी लगाई थी। विशेषज्ञों की मानें तो बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन के लिए तैयार किए गए नेशनल बिल्डिंग कोड और पर्यावरण मंत्रालय के नियमों का पालन नहीं होता है। अगर स्थानीय निकाय इसका पालन कराए तो प्रदूषण कम करने में मदद मिलेगी।