फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

इन सात गलतियों ने ही बिगाड़ा 'आप' का खेल

विज्ञापन
विज्ञापन
आज आम आदमी पार्टी ने अपने दो साल पूरे कर लिए हैं। अपने इन दो सालों के इतिहास में पार्टी ने जहां कुछ पाया तो वहीं बहुत कुछ खोया भी। कुछ कड़वी सच्चाईयां है जो आज भी आप का पीछा नहीं छोड़ रही हैं।
विज्ञापन


आप का अभ्युदय और उसकी शुरुआती जीत जहां किसी चमत्कार से कम नहीं रही तो वहीं दूसरी ओर पार्टी द्वारा इस जीत के बात किए गए गलत फैसलों ने आप के भविष्य का रास्ता संकरा कर दिया।

पार्टी को 2013 दिल्ली विधानसभा चुनाव की जीत के बाद कोई बड़ी सफलता हाथ नहीं लगी, बल्कि उसके खाते में एक के बाद एक बड़ी गलतियां जुड़ती चली गयीं। कभी दिल्ली चुनाव के बाद सरकार बनाना तो वहीं सरकार बनाने के बाद 49 दिन में सरकार गिरा देना जैसे फैसलों ने आम आदमी पार्टी से लोगों के विश्वास को दूर कर दिया।
विज्ञापन


पिछले दिल्ली चुनावों में जोश-खरोश से लवरेज आप आने वाले दिल्ली चुनावों में लड़खड़ाते कदमों से संघर्ष करती दिखाई दे रही है। आप आज अपना दूसरा जन्मदिन मना रही है, लेकिन उसे अपनी वो गलतियां भी याद हैं जिनकी वजह से चमत्कारी पार्टी धारा के विपरीत राजनीति करने में सफल नहीं रही।

आज हम आपको आम आदमी पार्टी की वो सात गलतियां बताने वाले हैं जो आप के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा बनीं। क्या हैं आप की सात गलतियां जानने के लिए पढ़े पूरी खबर

ये हैं आप की सात बड़ी गलतियां

8 जून 2014 को आम चुनाव के बाद केजरीवाल को भी एहसास हो गया कि उन्होंने अब तक कई गलतियां की हैं। पार्टी की कार्यकारिणी की बैठक में पार्टी संयोजक अरविंद केजरीवाल ने कहा कि सभी राज्यों की इकाई का पुनर्गठन करना जरुरी है। हमें गांव−गांव जाकर लोगों को पार्टी से जोड़ने की कोशिश करनी चाहिए। केजरीवाल ने स्वीकार किया कि वह भी इंसान हैं और उनसे गलती हो सकती है।

पहली सबसे बड़ी गलती दिल्ली में सरकार बनाना
दिल्ली में 2013 के विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी ने इतिहास रचा और दिल्ली में दूसरी बड़ी पार्टी बनकर उभरी। ये वो दौर था जब बीजेपी ने अपना विजयी अभियान शुरु किया था, लेकिन आम आदमी पार्टी ने भाजपा के विजयी रथ का दिल्ली में कामयाब नहीं होने दिया। इस चुनाव में आप को 70 में से 28 सीटें हाथ लगीं।

इस अप्रत्याशित जीत से खुश आम आदमी पार्टी ने पहले तो विपक्ष में बैठने का कदम उठाने की बात की, लेकिन उसके बाद कांग्रेस के समर्थन से दिल्ली में सरकार बना ली। राजधानी में कांग्रेस के सहयोग से सरकार बनाना आम आदमी पार्टी की सबसे बड़ी गलती साबित हुई।

विधानसभा चुनावों में पार्टी ने भ्रष्टाचार, परिवारवाद और कुशासन के खिलाफ चुनाव लड़ा था। लोगों को लगा कि आम आदमी पार्टी की विचारधारा बीजेपी के ज्यादा करीब नजर आ रही है। वहीं पार्टी ने जिस शासन के खिलाफ चुनाव लड़ा उसी से हाथ मिलाकर सरकार बना ली।

दूसरी बड़ी गलती 49 दिन में सरकार से इस्तीफा

पार्टी ने दिल्ली की जनता के हित को ध्यान मे रखकर सरकार बनायी तो इस गलती को पचाया जा सकता था, लेकिन लोकपाल के मुद्दे पर 49 दिन में ही मुख्यमंत्री के पद से केजरीवाल का इस्तीफा देना भी पार्टी को मंहगा पड़ गया।

पार्टी सोच रही थी, कि जनता उसके इस गलत फैसले का समर्थन करेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। बिजली पानी पर आप को वोट देने वाली दिल्ली की जनता पार्टी के इस फैसले से खुश नजर नहीं आई और वैसे भी आप ने चुनावों से पहले बिजली पानी को ही बड़ा मुद्दा बनाकर चुनाव लड़ा था।

ऐसे में दिल्ली की जनता ने उस पर भरोसा जताकर आप को वोट दिया था। आप ने जनता की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। जो आपकी दूसरी सबसे बड़ी गलती साबित हुई।

केजरीवाल ने स्टेडियम में शपथ ली, सड़क पर रात गुजारी, आम आदमी को परेशानी में डालकर सड़क पर धरना दिया और जब काम करने का मौका आया तो मैदान छोड़कर भाग खड़े हुए।

नहीं कर सके पार्टी का बचाव

आप पर लगातार आरोप लगते रहे, लेकिन विवादों से घिरे केजरीवाल ना खुद का और ना ही पार्टी का बचाव करने में सफल हो पाए। 'आप' को चर्चा में बने रहने के लिए विवादों की जरुरत नहीं थी पर पार्टी को इसका एहसास नहीं हुआ।

सोमनाथ भारती, राखी बिड़लान,केजरीवाल, कुमार विश्वास, आशुतोष, शाजिया इल्मी जैसे दिग्गज नेता एक के बाद एक विवादों में घिरते चले गए। कभी उनके फैसलों पर उंगलियां उठीं तो कभी उनकी कार्यप्रणाली पर। कभी उनके बयानों पर चर्चा हुई तो कभी उनके फैसलों पर। इन विवादों ने आप को उस गर्त में धकेल दिया जिससे पार्टी नहीं उबर सकी।

पार्टी से विवादों के जुड़ने से लोगों में नाराजगी का माहौल बन गया और यही वजह रही कि पार्टी नेताओं को जगह-जगह विरोध का सामना करना पड़ा।

उन पर कभी थप्पड़ पड़े तो कभी अंडे-टमाटर का भी शिकार पार्टी के नेताओं को होना पड़ा। इसी विरोध के चलते पार्टी के एक नेता का मुंह भी काला कर दिया गया। इन सब बातों से पार्टी मजाक की वजह बन गयी।

बिना संगठन लोकसभा का चुनाव लड़ना

जब 'आप' ने भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बड़ा अभियान छेड़ा तो सोशल मीडिया से लेकर आम आदमी के दिलों तक सभी जगह केजरीवाल छा गए। उन्हें लगने लगा कि वे प्रधानमंत्री पद के दावेदार हो सकते हैं और यहीं से उनका यह कैंपेन हवा हो गया।

भ्रष्टाचार की जगह उनकी जुबान पर मोदी विरोधी स्वर चढ़ गए। वे पानी-पी पीकर मोदी को कोसने लगे। शायद उन्हें लग रहा था कि मोदी को गाली देने भर से वे देश में भाजपा का विकल्प देने में सफल हो जाएंगे।

केजरीवाल ने 400 से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने की ठान ली। बिना संगठन सिर्फ भाजपा विरोधी लहर पैदा करने की गलती के चलते केजरीवाल गुजरात भी पहुंचे।

केजरीवाल यहां सिर्फ मोदी के खिलाफ बोलते नजर आए। मोदी विरोधी लहर को स्वर देने में केजरीवाल की पार्टी 'आप' सफल नहीं हो पाई और खुद ही ढेर हो गयी। हालांकि पहली बार चुनाव बार लोकसभा के चुनाव में उतरी पार्टी के लिए ये सफलता भी कम नहीं रही।

गलत सीट का चुनाव

'आप' को सबसे ज्यादा भारी केजरीवाल के बिना वजह दिये गये बयान ही भारी पड़े। आम चुनाव में इसी बड़बोलेपन के कारण केजरीवाल और कुमार विश्वास दोनों ने ही गलत सीटों का चुनाव किया, जिसका उन्हें खामियाजा भुगतना पड़ा।

केजरीवाल का मोदी के खिलाफ लोकसभा चुनाव में उतरना और कुमार विश्वास का राहुल गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ना पार्टी के भविष्य के लिए नुकसानदायक साबित हुआ।

इसके अलावा आशुतोष की सीट के चयन के अलावा शाजिया इल्मी की सीट के साथ साथ कई अन्य सीटों के चुनाव में पार्टी ने गलतियां की, जिसका सीधा नुकसान लोकसभा चुनाव में पार्टी को झेलना पड़ा।

बहुत मेहनत के बाद केजरीवाल अपनी और कुमार विश्वास दोनों सीटों पर आप की जमीन तैयार करने में सफल रहे, पर जीतने के लिए यह काफी नहीं था। अगर वे किसी अन्य सीट पर चुनाव लड़ते तो हो सकता है 'आप' की एक-दो सीटें और बढ़ जातीं।

पार्टी में गुटबाजी ने किया आप का नुकसान

पार्टी पर गुटबाजी के आरोप लगे जिस वजह से 'आप' नेताओं में फूट पड़ती दिखाई दी। शुरु के दिनों में पार्टी का सुर ही नेताओं का सुर हुआ करता था, पर जैसे-जैसे वक्त आगे बढ़ा सभी के सुर बदल गए। किसी ने अपनी सीट की बदलने की वजह से पार्टी से किनारा करने की सोची तो किसी ने केजरीवाल पर ही कई तरह के गंभीर आरोप मढ़ दिये।

इसी गुटबाजी और नाराजगी के चलते एक-एक कर कई दिग्गज चुनाव मैदान से भाग खड़े हुए। कई पार्टी ने नेता आप का दामन छोड़ कर बीजेपी, कांग्रेस जैसी पार्टियों में शामिल हो गए। कई संस्थापक सदस्यों ने पार्टी की बदहाल स्थितियों से परेशान होकर 'आप' से किनारा कर लिया।

एक समय तो ऐसी खबर आई थी कि कुमार विश्वास केजरीवाल से इसलिए नाराज हैं, क्योंकि उन्हें अमेठी में अकेला छोड़ दिया गया है और केजरीवाल उनका प्रचार नहीं कर रहे हैं। कई मौकों पर नेताओं के बयान को व्यक्तिगत बताकर उससे किनारा करने की कोशिश की गई। इससे दूसरे दलों को आप का नुकसान करने का ज्यादा मौका मिल गया।
विज्ञापन

केजरीवाल ने लिया मीडिया से पंगा

आप' को मीडिया से दो- दो हाथ करना मंहगा पड़ गया। पार्टी जिस तरह से गलतियों को बढ़ा रही थी मीडिया ने उन गलतियों को सबके सामने रखा।

इस वजह आप के मुखिया केजरीवाल और अन्य आप नेता मीडिया से तल्ख स्वर में बात करते नजर आए। ये वही पार्टी थी जो पिछले विधानसभा चुनावों और अन्ना आंदोलन के बाद मीडिया की तारीफें करने से नहीं चूकती थी।

जब मीडिया ने मोदी से जुड़ी खबरें ज्यादा दिखाई तो वे उस पर ही नाराज हो गए। आरोप लगाया गया कि मीडिया उनकी खबरों को ठीक तरह से नहीं दिखा रहा है, मीडिया बिका हुआ है। इस वजह से मीडिया ने भी उनकी गलतियों को खूब उजागर किया। पार्टी की इन हरकतों की वजह से भी लोग उनसे नाराज दिखाई दिए।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें