दिल्ली का सियासी माहौल लगातार रोचक होता जा रहा है। मतदान में अभी दो दिन बचे हैं। लोगों की धड़कनें तेज हैं। दिल्ली जानना चाहती है कि आखिर अब दिल्ली के सिंहासन पर किसका कब्जा होगा।
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ऐसे में वो बातें अहम हो जाती हैं जिनकी वजह से दिल्ली की महाभारत इतनी रोचक हो गई, जिसपर पूरे देश समेत विदेशों की भी नजर है। आज हम बताएंगे 'आप' और बीजेपी की वो गलतियां जिसने दिल्ली का चुनाव एकतरफा ना कर रोचक बना दिया है।
आज बीजेपी ने 70 उम्मीदवारों को रोड शो का हुक्म दे दिया। आखिरी वक्त में बीजेपी ने पूरी ताकत झोंक दी। ये जल्दबाजी उस वक्त नहीं होती अगर बीजेपी ये गलतियां नहीं करती।
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बीजेपी ने मास्टर स्ट्रोक खेलने में कर दी देर
महज मोदी आस की वजह से बैठे रहने बीजेपी के लिए मुश्किल बन गया। बीजेपी हर्षवर्धन की अच्छी छवि पर भरोसा नहीं कर पाई। अगर उन्हें उतारा जाता तो यह दांव ज्यादा बेहतर होता।
बीजेपी ने केजरीवाल के खिलाफ किरण बेदी को उतारकर मास्टर स्ट्रोक खेला, इसका उसे फायदा भी मिल सकता था, लेकिन उसने बहुत देर कर दी।
बेदी को लाने से पहले पार्टी के दिग्गज नेताओं को भरोसे में नहीं लिया। सतीश उपाध्याय को भी टिकट नहीं मिला। ऐसे में स्थानीय नेतृत्व में असंतोष पैदा हो गया।
किरण को नहीं मिली राजनीति की ट्रेनिंग
पुलिस अफसर रहीं किरण को अफसरशाही की ट्रेनिंग तो मिली, लेकिन राजनीति की ट्रेनिंग नहीं मिल सकी। अगर उन्हें राजनीति की ट्रेनिंग दी होती तो बात बन सकती थी।
बेदी ने एजेंडा अपना रखा और वोट मोदी के नाम पर। ये बिल्कुल उल्टा हो गया। अगर बेदी मोदी का एजेंडा रख कर उस वोट मांगती या अपना एजेंडा रख अपने एजेंडे पर ही वोट मांगती तो तस्वीर बदल सकती थी।
भ्रष्टाचार दिल्ली के लिए बड़ा मुद्दा है केजरीवाल उस पर लगातार बोलते रहे, लेकिन भाजपा ने विजन डॉक्यूमेन्ट में इस पर सिर्फ खानापूर्ति ही की।
इस तरह से किया भाजपा ने अपना नुकसान
केजरीवाल को टारगेट बनाकर भाजपा ने अपना ज्यादा नुकसान किया। इस कैम्पेन से भाजपा के ऊपर नकारात्मक राजनीति करने का ठप्पा लग गया। जिससे बीजेपी इस चुनाव में उबर नहीं पाई।
बीजेपी मध्यमवर्गीय मतदाता के साथ-साथ झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले मतदाता को अपने पक्ष में कर लेती तो स्थिति बदल सकती थी। क्योंकि आम-आदमी पार्टी का सबसे बड़ा मतदाता वही है।
भाजपा ने दिल्ली में चुनाव कराने में देर कर दी। आप ने उस चुनावों से सबक लिया तो वहीं बीजेपी दिल्ली पर फोकस करना ही भूल गई।
ये ना होता तो बहुमत से जीत जाती आप
कुछ सर्वे जहां आप की जीत दिखा रहे हैं तो वहीं दूसरी ओर कुछ में बीजेपी ने आप पर बढ़त बना ली है। अगर आप ने बातों पर गौर करती तो उसे इतना परेशान होने की जरूरत ही ना होती। क्योंकि कांटे की टक्कर में त्रिशंकु विधानसभा के भी पूरे आसार हैं।
आप बीजेपी पर मुद्दों से वार करने में थोड़ा देर और ना करती तो आप दिल्ली में बीजेपी पर आसान बढ़त बना लेती। इस बढत का फायदा होता कि केजरीवाल की सीएम की कुर्सी तक की राह बेहद आसान हो जाती।
सीएम की कुर्सी से इस्तीफे के बाद केजरीवाल ने मीडिया को अपना दुश्मन मान लिया। उसे बिका हुआ तक कह दिया। अगर वो ऐसा ना करते तो माहौल उनके पक्ष में और होता।
बीजेपी के गुटों पर अगर होता तीखा प्रहार
जिस तरह से बीजेपी राष्ट्रीय राजनीति और मुद्दों पर अपनी पकड़ मजबूत करती जा रही थी। उसी तरह से आम आदमी पार्टी भी दिल्ली के मुद्दों पर अपनी पकड़ बेहद मजबूत कर सकती थी।
केजरीवाल बीजेपी के गुटों पर तीखा प्रहार कर सकते थे। दिल्ली में टूटती बीजेपी और पार्टी के बीच फैला असंतोष उनके लिए फायदे का सौदा हो सकता था।
किरण पर आन ने नरमी बरती। पार्टी के पास किरण के खिलाफ अच्छे खास मुद्दे थे। अगर उन्हें आप अपना लेती तो चुनाव एकतरफा भी हो सकता था। जैसा लोकसभा में राहुल गांधी के साथ किया गया।
केजरीवाल को यहा प्रचारित करना चाहिए था कि केजरीवाल मुख्यमंत्री पद के दावेदार नहीं होते तो किरण को सीएम का उम्मीदवार तो क्या भाजपा का टिकट भी नहीं मिलता।
यदि वे अब मुख्यमंत्री बन भी गईं तो वो मोदी के लिए उसी तरह से होंगी जिस तरह से सोनिया के लिए मनमोहन सिंह। भाजपा प्रचारित कर रही है कि केन्द्र और राज्य में एक ही पार्टी की सरकार होने से फायदा मिलेगा। केजरीवाल इसे भाजपा की धमकी बता सकते थे।
केजरीवाल ने दो अलग-अलग कैंपेन चलाए पहले इस्तीफा की माफी और फिर 49 दिन के अच्छे कामों का कार्यकाल गिनाया। अगर ये दोनों कैम्पेन साथ-साथ होते तो और फायदा मिल सकता था।