‘चिट्ठी आई है, आई है, चिट्ठी आई है’ वो दिन दूर नही जब बच्चे यह गाना सुन बड़ो से पूछेंगे चिट्ठी क्या होती है। अब चिट्ठी नहीं मेल आता है।
जैसे-जैसे देश में मोबाइल क्रांति आई, वैसे-वैसे चिट्ठी का दौर समाप्त होता जा रहा है। वर्तमान में तो हालत यह है कि पांच प्रतिशत लोग भी अपने चहेतों को चिट्ठी नहीं लिखते।
अब सीधे एसएमएस या फिर व्हाट्स अप का प्रयोग किया जाता है। कुछ युवाओं को यह भी नही पता कि अंतर्देशीय पत्र क्या होता है। गाजियाबाद में तो ज्यादातर लैटर बॉक्स भी खस्ताहाल और टूटे पडे़ हैं।
आज से बीस साल पहले लोगों के कान पोस्टमैन की आवाज और निगाहें दरवाजे पर टिकी होती थी कि कब चिट्ठी आएगी।
चिट्ठी आते ही घर के सारे लोग इकट्ठा होकर चिट्ठी पढ़ते थे। उसका एक अलग ही मजा होता था। लिखने का लहेजा इतना अच्छा होता था कि पढ़ने और सुनने वाला भाव विभोर हो जाता था।
सोशल मीडिया ने आज के युवाओं को व्यस्त कर दिया है। अधिकतर युवा ये नही जानते कि पोस्ट कार्ड और अंतरदेशीय पत्र क्या होता है। आज कम्यूनिकेशन के तमाम माध्यम उपलब्ध हैं।
पोस्ट कार्ड और अंतर्देशीय पत्रों की मांग नाममात्र की रह गयी है। वरिष्ठ डाक अधीक्षक आरपी सिंह ने बताया कि अब अंतर्देशीय और पोस्ट कार्ड की मांग बहुत कम हो गई है।
लोग इंटरनेट, ई-मेल, ट्वीटर, मोबाइल आदि के माध्यम से कम्यूनिकेशन करने लगे है। अब तो लोगों के कर टैक्स, अप्वाइंटमेंट लेटर, बैक के कागजात आदि आते हैं।
स्थ्ाानीय निवासी संजय बैसोया का कहना है कि मोबाइल फोन और इंटरनेट के आने के पहले चिट्ठियों का खूब चलन
था अच्छा लगता था जब कहीं से चिट्ठी आती थी। अब तो फोन से समाज पर बुरा
असर पड़ रहा है युवा अपने आप में व्यस्त हो गए है।
पीडी सिरोहणी का कहना है कि चिट्ठी
का अपने आप में अलग महत्व है हमारे जमाने में लोग चिट्ठियों से ही बात
किया करते थे चिट्ठियों को लोग संभालकर रखते थे। आज इंटरनेट फोन आदि से लोग
जुड़ गए और चिट्ठी को भूल गए है।