अस्पताल में ग्लूकोज की बोतल हाथ में पकड़ा तिमारदार
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यह प्रदेश की आर्थिक राजधानी गुडग़ांव का सरकारी अस्पताल है। इस शहर से प्रदेश सरकार सबसे ज्यादा राजस्व एकत्र करती है। लेकिन स्वास्थ्य सेवाओं का ऐसा बुरा हाल है कि मरीजों की लाचारी देखकर आप खुद ब खुद कह उठेंगे कि यहां स्वास्थ्य सेवाओं के बहुत बुरे दिन हैं।
यहां का कुप्रबंधन देखकर मरीजों के जख्म और गहरे हो जाते हैं। दर्द से निजात की उम्मीद ही छोड़ दीजिए। स्वास्थ्य सेवाओं की बेहतरी का ढिंढोरा केंद्र सरकार भी पीट रही है और अपने आपको प्रोग्रेसिव स्वास्थ्य मंत्री की इमेज में ढालने वाले अनिल विज भी वाहवाही करते नहीं थक रहे हैं।
लेकिन प्रदेश की आर्थिक राजधानी गुडग़ांव में स्वास्थ्य सेवाएं बदहाल हैं। यहां आने वाला हर मरीज अपनी तकलीफ से ज्यादा यहां की व्यवस्थाओं और तंत्र से त्रस्त होता है। कैबिनेट मंत्री राव नरबीर सिंह का घर इस अस्पताल से चंद कदम कुछ ही दूर है लेकिन उन्होंने यहां कभी झांक कर नहीं देखा।
गलियारे में मरीज को लिटाया, चढ़ाई गई ग्लूकोज
कहने के लिए इस अस्पताल का करोड़ों का बजट है, लेकिन बुधवार को एक गंभीर मरीज की लाचारी और बेबसी देखकर ऐसा लगा कि जैसे यहां सबकुछ कागजों में हो रहा है।
मरीज को तो न स्ट्रेचर मिला और न ही व्हील चेयर। ग्लूकोज की बोतल हाथ में पकड़ कर मरीज को परिजन ले जा रहे थे। बेड नहीं मिला तो उसे जमीन पर लिटा दिया।
डॉक्टर के इस्तीफा देने के बाद अब कैंसर मरीजों को अस्पताल से लौटाया जा रहा है
अस्पताल में जमीन पर लेटा मरीज
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कैंसर वार्ड बंद कर दिया, अब आईसीयू की बारी
प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज कैंसर रोगियों के लिए बेहतर तकनीक और इलाज को लेकर दावा कर रहे हैं। वहीं प्रदेश के एक मात्र नागरिक अस्पताल में चल रही कैंसर ओपीडी अब बंद हो गई है।
कैंसर विशेषज्ञ डॉक्टर के इस्तीफा देने के बाद अब कैंसर मरीजों को अस्पताल से लौटाया जा रहा है। बता दें कि यहां 2007 में कैंसर वार्ड की शुरुआत हुई थी। बताया जा रहा है कि अब आईसीयू भी बंद होने की कगार पर पहुंच गया है।
कागजों में हैं सारी सेवाएं: आरटीआई कार्यकर्ता
-आरटीआई कार्यकर्ता अभय जैन के मुताबिक चमक-दमक वाली साइबर सिटी में सरकार स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर करना ही नहीं चाहती, क्योंकि ऐसा करने से फाइव स्टार अस्पतालों की कमाई पर असर पड़ेगा।
पिछले कुछ साल में यहां निजी सेक्टर के अस्पतालों में 5000 बेड जुड़े हैं। लेकिन सरकारी अस्पतालों की दशा और खराब होती चली गई। सारी सुविधाएं कागजों में हैं। स्ट्रेचर, व्हील चेयर सब।
डॉक्टरों का टोटा:
जिले के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में सिर्फ एक फिजिशियन, एक ईएनटी और एक चर्म रोग विशेषज्ञ से काम चलाया जा रहा है। डॉक्टरों की भर्ती का दावा किया जा रहा है लेकिन यहां तो डॉक्टर आते नहीं दिख रहे हैं।
साइबर सिटी के सरकारी अस्पताल की बिल्डिंग खस्ताहाल है। पिछले माह यहां इसका फॉल सीलिंग गिर गई थी, जिसमें दो मरीज घायल हुए थे। यहां रोजाना औसतन 2000 मरीजों की ओपीडी होती है, 200 बेड का अस्पताल है।
बुधवार को मरीज के साथ जो कुछ भी हुआ गलत हुआ। इस घटना की जानकारी नहीं है। पीएमओ से रिपोर्ट ली जाएगी। डॉक्टरों की कमी पूरी करने के लिए विभाग को पहले ही लिखा जा चुका है। -डॉ. रमेश धनखड़, सीएमओ