द कश्मीर फाइल्स फिल्म के समर्थन और विरोध के बीच कश्मीरी पंडितों के संगठन ग्लोबल कश्मीरी पंडित डायस्पोरा (जेकेपीडी) ने इसे धर्म के चश्मे से न देखने की अपील की है। संगठन ने कहा कि फिल्म को हिंदू-मुस्लिम के नजरिये से न देखें। यह फिल्म बताती है कि कश्मीरी पंडितों के नरसंहार और निष्कासन के समय व्यवस्था कैसे ध्वस्त हो गई थी।
जीकेपीडी ने अन्य राज्यों से भी फिल्म को कर मुक्त करने की मांग की है। नरसंहार की जांच के लिए न्यायिक आयोग के गठन के साथ ही संगठन ने कश्मीरी पंडितों की घर वापसी के लिए नया शहर बनाने की मांग की है। जीकेपीडी के सह संस्थापक सुरेंद्र कौल ने कहा कि सच को सामने लाने के लिए हमें आगे आना पड़ा। फिल्म निर्माता विवेक अग्निहोत्री से फिल्म के जरिए सच्चाई लाने का अनुरोध करना पड़ा। फिल्म के विरोध के सवाल को खारिज करते हुए कौल ने कहा कि कश्मीरी पंडितों का नरसंहार एतिहासिक सच है। यह न तो प्रोपेगंडा फिल्म है और न ही इसके जरिए हिंदुओं के ध्रुवीकरण करने की कोशिश हो रही है। उन्होंने कहा कि इतिहास का सच दुखदायी हो सकता है मगर इसका मतलब यह नहीं है कि इतिहास ही पढ़ाना बंद कर दिया जाए।
दुनिया के सामने सच
कौल ने कहा कि हम कश्मीर में हुए नरसंहार का सच सामने लाना चाहते थे। दुनिया को बताना चाहते थे कि आखिर क्यों कश्मीरी पंडित नरसंहार और अमानवीय निष्कासन का शिकार हुए। नरसंहार पर जानकारी छिपाई गई। हम किसी धर्म या किसी देश के खिलाफ नहीं हैं। यह फिल्म नरसंहार के दौरान ध्वस्त हुए व्यवस्था को दर्शाता है।
जगमोहन पर आरोप गलत
कौल ने कहा कि नरसंहार के लिए तत्कालीन राज्यपाल जगमोहन को जिम्मेदार ठहराया जाता है। जबकि कश्मीरी पंडितों को टारगेट किलिंग मार्च 89 में ही शुरू हो गया था। आरोप लगाने वालों को पता है कि उस समय किसकी सरकार थी। नरसंहार और पलायन की पटकथा पहले ही लिख दी गई थी। संगठन आरोपों-प्रत्यारोपों में नहीं उलझना चाहता।
कश्मीर में अपना शहर बसाएंगे
संगठन ने कहा कि हम कश्मीर में अपना शहर बसाना चाहते हैं। ऐसा शहर जहां विश्वविद्याल, कॉलेज सहित सारी मूलभूत सुविधाएं हों। जहां तिरंगा लहराए। ऐसा शहर जो दुनिया के लिए उदाहरण बने। विस्थापित हुए दस लाख कश्मीरी पंडित अपनी धरती पर वापस लौटना चाहते हैं।
न्यायिक आयोग की मांग
संगठन ने नरसंहार और पलायन मामले की जांच के लिए न्यायिक आयोग के गठन की मांग की। कौल ने कहा कि कश्मीरी पंडितों को तीन दशक के बाद भी न्याय का इंतजार है।