उमेश नागर के हौसले के आगे हारी जिंदगी
- फोटो : ब्यूरो/अमर उजाला, नोएडा
कभी महक की तरह गुलों से उड़ते हैं, कभी धुएं की तरह पर्वतों से उड़ते हैं, ये कैंचियां हमें उड़ने से क्या खाक रोकेंगी, हम परों से नहीं, हौसलों से उड़ते हैं। मशहूर शायर राहत इंदौरी की ये पंक्तियां उमेश नागर के संघर्ष की कहानी बयां करती हैं।
14 साल पहले उन्होंने एक हादसे में अपना दायां हाथ खो दिया था, लेकिन उनके कड़े संघर्ष और शिक्षिका बनने सपना पूरा करने की जिद के आगे लाचारी हार गई। उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा पूरी की, फिर बीटीसी के बाद डीलिट किया और अब वह शिक्षिका हैं।
च्चों को पढ़ाते वक्त बाएं हाथ से ब्लैक बोर्ड पर लिखना आज भी उनके लिए मुश्किल होता है लेकिन निराशा उन्हें मंजूर नही। दनकौर के नवादा गांव की उमेश नागर ने बताया कि उनका शुरू से ही शिक्षिका बनने का सपना था। 2002 में दसवीं की बोर्ड परीक्षा के समय एक दिन चारा काटने वाली मशीन की चपेट में उनका दायां हाथ आ गया।