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बेलगाम शोर से कान हो रहे कमजोर

Sun, 05 Apr 2015 11:54 PM IST
डीपी आर्य/अमर उजाला, गाजियाबाद
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दिल्ली-एनसीआर का वायु प्रदूषण लगातार चर्चाओं में रहा है। इससे बचाव के कई नियम-कायदे भी लागू किए गए हैं। अबकी बार ध्वनि प्रदूषण का खतरा विकराल रूप धारण करके सामने आया है।
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पर्यावरण विभाग के शोध में पाया गया है कि यहां के लोगों के सुनने की संख्या लगातार कम हो रही है। यदि इसी तरह ध्वनि प्रदूषण बढ़ता रहा तो एक दशक में यहां बुजुर्ग बहरों की संख्या एक मुसीबत बनकर उभरेगी।

दिल्ली एनसीआर में विकास तेजी से हुआ है। इसके चलते यहां कारखानों-वाहनों की संख्या बढ़ी है और देशभर के लोगों का यहां पलायन हुआ है। इससे शोर लगातार बढ़ता जा रहा है।
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आलम यह है कि जिस क्षेत्र को शांत माना जाता है, वहां पर भी ध्वनि प्रदूषण का असर देखने को मिल रहा है। वाहनों और कारखानों का शोर लोगों को बेचैन कर रहा है।

ध्वनि प्रदूषण का असर मनुष्यों के साथ ही पशु-पक्षियों पर भी पड़ रहा है। बढ़ते शोर से लोगों में हाई बीपी, हाइपरटेंशन आदि बीमारियां घर बना रही हैं। सबसे ज्यादा प्रभावित लोगों की सुनने की क्षमता हो रही है।

पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार लोगों को 80-85 डेसिबल की ध्वनि सबसे अच्छी रहती है। पॉल्यूशन विभाग के सर्वे के अनुसार, एनसीआर में लोगों को 10 घंटे से ज्यादा 130-160 डेसिबल शोर का सामना करना पड़ रहा है।

विशेषज्ञों के अनुसार तेज आवाज से लोगों के कान का पर्दा कमजोर हो रहा है और नसों में सूजन आ रही है। इससे सुनने की क्षमता प्रभावित हो रही है।

शोर केचलते 70 फीसदी लोगों के कान 50 साल की आयु तक सुनने की 40 फीसदी क्षमता खो चुके होते हैं। 50 साल की आयु से ही कानों की सुनने की क्षमता प्रभावित हो रही है। अब बच्चों के कान भी प्रभावित होने लगे हैं। गर्भवती महिलाओं पर इसका असर पड़ रहा है।

बढ़ते शोर से सबसे ज्यादा नुकसान कानों को हो रहा है। शोर को नियंक्ष्ति करने के साथ ही इससे कानों को बचाने की जरूरत है। तेज साउंड, डीजे और ज्यादा शोर वाले स्थानों पर कानों को बंद करके रखें। यदि अभी से सावधानी नहीं बरती गई तो आने वाले दिनों में बहरापन बड़ी समस्रूा बनकर उभरेगा।- डाॅ. बीपी त्यागी, ईएनटी विशेषज्ञ।
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