नेताओं का दल बदल हो या फिर इनकी पार्टियों के बीच गठबंधन, दिल्ली वालों को कभी ये सियासत के रूप रास नहीं आए। यहां की जनता हमेशा से ही बहुमत वाली सरकार के पक्ष में रहती है। फिर चाहे वह भाजपा हो, कांग्रेस या आम आदमी पार्टी। चुनाव लडने वाली राजनैतिक पार्टियों में से किसी एक को ही जनाधार मिलता आया है। बाकी अपने मतदान प्रतिशत की बढ़ोत्तरी और कमी के गणित की समीक्षा ही करती रहती हैं।'
हालांकि एक बार (2013 में) जनता की इस रोचक पसंद का अपवाद जरूर दिखा, तब सरकार ही 49 दिन में उखड़ गई। उस वक्त दिल्ली वालों ने भाजपा को करीब 33, आप को 29.5 और कांग्रेस को 24.6 फीसदी ही अपनी पसंद का हिस्सा माना। भाजपा को 34, आप 28 और कांग्रेस को 9 सीटें मिली थीं।
भले ही भाजपा को मतदान ज्यादा हुआ, लेकिन तब आप-कांग्रेस के बीच गठबंधन हुआ और 49 दिन बाद सीएम ने इस्तीफा दे दिया।
अब ऐसे ही दिल्ली की पहली विधानसभा (1952) से 2015 तक के चुनाव ही देख लीजिए। ज्यादात्तर लोगों को मालूम में है कि इन 63 वर्षों में चार बार महानगर परिषद और सात बार विधानसभा चुनाव हो चुके हैं।
1967 से 1992 तक दिल्ली में विधानसभा भंग थी और यहां महानगर परिषद के लिए चुनावी रण हुआ करता था। इनमें भी दिल्ली के करोड़ों मतदाताओं ने सबसे ज्यादा अपना मत कभी किसी तो कभी किसी और पार्टी को दिया। उस वक्त चुनाव में मुख्य रण भाजपा-कांग्रेस के बीच ही हुआ करता था।
आम आदमी पार्टी तो 2013 के चुनाव से मैदान में है। इन तथ्यों के आधार पर ये कहना गलत नहीं कि फुल फ्लैश सरकार के लिए दिल्ली का प्रेम हमेशा न्यौछावर है। एक बार फिर दिल्ली में चुनाव है। फिर गलियों में नेता घूम रहे हैं। अब देखना यह है कि 11 फरवरी को दिल्ली वाले कैसा जनादेश देश के सामने रखते हैं।
विधानसभा में जनता की पसंद
वर्ष सरकार मत प्रतिशत कुल सीटें
1952 कांग्रेस 52.09 39
1993 भाजपा 47.82 49
1998 कांग्रेस 47.76 52
2003 कांग्रेस 48.13 47
2008 कांग्रेस 40.31 43
2013 गठबंधन आप (29.5), कांग्रेस (24.6) आप (28)-कांग्रेस (09)
2015 आप 54.3 67
महानगर परिषद में पसंद
वर्ष सत्ता मत प्रतिशत सीटें
1972 कांग्रेस 48.54 44
1977 जनता पार्टी 52.58 46
1983 कांग्रेस 47.50 34
(वर्ष 1967 में जनसंघ को सत्ता मिली थी,लेकिन आयोग के पास मत प्रतिशत की जानकारी नहीं है।)