आतंकियों के खिलाफ मुकदमे वापस लेने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से जवाब तलब किया है। सुप्रीम कोर्ट ने पूछा है कि आखिर क्यों और किस आधार पर वह आतंकियों के खिलाफ मुकदमे वापस लेना चाहती है।
जबकि यूपी सरकार ने इस बारे में केंद्र सरकार से कोई अनुमति नहीं ली गई है। सर्वोच्च अदालत ने शुक्रवार को सख्त लहजे में प्रदेश सरकार को इसके कारणों के बारे में 7 मार्च को होने वाली अगली सुनवाई में सूचित करने को कहा है।
बता दें कि प्रदेश सरकार की मंशा पर हाईकोर्ट के फैसले ने पानी फेर दिया था, जिसके खिलाफ राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट पहुंची है। लेकिन अब तक इस मामले में अदालत ने प्रतिपक्षों को नोटिस तक नहीं जारी किया है।
'क्यों नहीं मांगी केंद्र से अनुमति'
जस्टिस एचएल दत्तू की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष प्रदेश सरकार की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता यूयू ललित ने कहा कि हाईकोर्ट की ओर से इस मसले पर की गई कानूनी व्याख्या उचित नहीं है। मुकदमे लेने के मसले पर राज्य सरकार फैसला ले सकती है।
पीठ ने कहा कि जेल में बंद आरोपियों के खिलाफ गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम के तहत मामला है। ऐसे में केंद्र की ओर से अनुमति क्यों नहीं ली जानी चाहिए।
इसके जवाब में यूपी सरकार के अधिवक्ता ने कहा कि यूपी एमेंडमेंट एक्ट लाए जाने के बाद मुकदमा वापस लेने के मामले में केंद्र से अनुमति की जरूरत नहीं है। इस पर पीठ ने पूदज्ञ कि आखिर क्यों राज्य सरकार आतंकी गतिविधि में दर्ज मामलों के मुकदमे वापस लेना चाहती है। किन आधारों पर राज्य सरकार की ओर से यह निर्णय लिया गया है।
यूपी सरकार ने मांगा समय
यूपी सरकार के अधिवक्ता ने कहा कि जिन 14 मामलों में राज्य सरकार मुकदमे वापस लेना चाहती है, उनकी वजह बताने के लिए थोड़ा समय चाहिए होगा।
इस पर पीठ ने राज्य सरकार को एक सप्ताह का समय प्रदान करते हुए 7 मार्च को सुनवाई की अगली तारीख तय कर दी। याचिका में राज्य सरकार ने कहा है कि हाईकोर्ट की ओर से इस मसले पर की गई कानूनी व्याख्या उचित नहीं है।
साथ ही हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाने की मांग की है। यूपी सरकार ने याचिका में यह भी कहा है कि हाईकोर्ट के फैसले के चलते ट्रायल कोर्ट में लंबित मुकदमों की वापसी के आवेदन पर भी सीधा प्रभाव पड़ रहा है।
चुनावी फायदा देख रही है सपा सरकार!
दरअसल राज्य सरकार आंतकियों के खिलाफ 14 मुकदमे वापस लेना चाहती है। लेकिन हाईकोर्ट ने फैसले में कहा कि राज्य सरकार यह मुकदमे केंद्र सरकार की अनुमति के बिना वापस नहीं ले सकती।
हाईकोर्ट ने 12 दिसंबर के फैसले में कहा है कि आरोपी गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम में आरोपी हैं जो कि केंद्रीय कानून है। ऐसे में मुकदमा वापस लेने के लिए केंद्र की मंजूरी जरूरी है।
हालांकि हाईकोर्ट का यह फैसला राज्य सरकार को चुनावी माहौल होने की वजह से ज्यादा परेशान कर रहा है। यही वजह है कि राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से जल्द सुनवाई की मांग की है।