छह माह पहले जवाहर लाल विश्वविद्यालय यानी लाल दुर्ग में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की छात्र शाखा ऑल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन के कन्हैया कुमार को छात्र संघ अध्यक्ष के रूप में चुनकर छात्रों ने लाल सलाम बोला।
कौन कह सकता था कि कन्हैया लेफ्ट दलों व उससे जुड़े संगठनों के लिए चैन की राजनैतिक बंसी बजाने का माध्यम बनेगा। जिस तरह से बृहस्पतिवार को मंडी हाउस दिल्ली, बिहार, बंगलुरु, हैदराबाद व कोलकाता सहित देश के कई स्थानों पर कन्हैया के पक्ष में पोस्टरों के साथ प्रदर्शन हुए उससे साफ है कि उसे लेकर वाम दलों ने एक बड़ी रणनीति बनाई है।
जेएनयू में हमेशा लेफ्ट से जुड़े छात्र संगठनों आइसा, एआईएसएफ, एआईडीएसओ, एसएफआई का दबदबा रहा है। यह संगठन अलग-अलग या गठबंधन के तहत जेएनयू छात्र संघ में अपनी ताकत दिखाते रहे हैं।
जमीन को किसी भी कीमत पर छोड़ने को तैयार नहीं हैं
वाम संगठनों का यहां कितना प्रभाव है यह इससे ही पता चलता है कि जेएनयू छात्र संघ में इस वर्ष एबीवीपी को सेंट्रल पैनल में 14 साल बाद तो वर्ष 2014 में एनएसयूआई को 20 वर्ष बाद ही जगह मिल सकी थी। वामपंथी दल जेएनयू में अपनी जमीन को किसी भी कीमत पर छोड़ने को तैयार नहीं हैं।
पश्चिम बंगाल चुनाव इसी वर्ष होने हैं, ऐसे में तीन दशकों से अधिक समय तक वहां पर राज करने वाले वामपंथी दल सीपीआई (एम) ममता बनर्जी से सत्ता छीनने के लिए जेएनयू मुद्दे को भुनाएंगे।
हालांकि सभी वाम नेताओं का जोर यही रहेगा कि जिन लोगों ने देश के खिलाफ नारे लगाए हैं उन पर कड़ी कार्रवाई की जाए। देशद्रोह में कन्हैया की जेएनयू से गिरफ्तारी के बाद सवाल उठने पर अब लेफ्ट संगठन इसे जेएनयू में भगवा बनाम लाल झंडे की लड़ाई बताकर भुनाने की तैयारी में भी जुट गए हैं।
इसी कड़ी में कई वामपंथी धुरंधर इसकी रणनीति बनाने में जुटे
कन्हैया की गिरफ्तारी के बाद सीपीआई मार्क्सवादी नेता सीताराम येचुरी व डी राजा सबसे पहले सक्रिय हुए थे। इसी कड़ी में कई वामपंथी धुरंधर इसकी रणनीति बनाने में जुट गए हैं।
दरअसल, पश्चिम बंगाल, केरल व त्रिपुरा में सीपीआई (एम) की सत्ता तक पहुंचने की हैसियत है, लेकिन मजबूत छात्र संगठनों व श्रमिक संगठनों के दम पर वामपंथी समर्थक देश में हर जगह कायम हैं।
सीपीआई व सीपीआई (एम) सहित अन्य वामपंथी विचारधारा के संगठन कन्हैया की गिरफ्तारी व अपनी विचारधारा को जनता के बीच ले जाकर राजनैतिक लाभ लेने की कोशिश करेंगे। इसी कड़ी में मंडी हाउस से जंतर मंतर तक के मार्च में अप्रत्याशित भीड़ ने तिरंगे के साथ पहुंचकर अपनी ताकत दिखाई।