'क्या बताऊं जी। भाई साल भर बाद आया है। इसका बड़ा करोबार है और पाकिस्तान के साथ कई देशों में आउटलेट हैं। दिल्ली भी कारोबार के सिलसिले में ही आना होता है। प्रदर्शनी के चलते ही मुलाकात हो पाई है। फिर भी, तसल्ली से बात नहीं हो पाती। रविवार की शाम ही इसकी वापसी है।'
प्रगति मैदान में एएफ टेक्सटाइल पर यह बात दिलशाद मियां ने कही। भाई से मुलाकात की खुशी उनके चेहरे पर साफ दिख रही थी।
दिलशाद फिलहाल चांदनी चौक में रहते हैं, जबकि भाई फरीद 1947 में पाकिस्तान चला गया था। फरीद ने बताया कि शुरुआत में बड़ी परेशानी उठानी पड़ी, लेकिन धीरे-धीरे कारोबार चल निकला। उन्होंने कहा कि कारोबारी का हिंसा से कोई ताल्लुक नहीं होता। कट्टरता भी उसमें नहीं होती। दुबई में मेरे दो आउटलेट हैं, इसमें आठ हिंदू काम करते हैं।
सभी का साथ-साथ खाना और रहना होता है। आपसी टकराव जैसी बात ही नहीं रहती। फिर, वहां बड़ी तादाद में हिंदू हैं। लेकिन वहां तो कभी दंगा नहीं हुआ। सब अपने-अपने काम में मस्त हैं। भारत-पाक का तनाव सियासतदानों की दिमागी उपज है।
पाक एक्सपोर्टर व सलीम एसोसिएट्स के अध्यक्ष अब्दुल सबूर ने कहा कि दोनों देशों में फर्क नहीं है। तहजीब तो एक जैसी है ही, आप भारत में घूमिए या पाकिस्तान में, रास्ते भी एक से लगेंगे।
वैसे ही फुटपाथ, बिजली के खंभे, वाहनों की रेलमपेल, दूर-दूर तक फैले गांव, शहरों की घनी बसावट, ढाबे-रेस्त्रां। सीमा न पड़े तो पता भी नहीं होगा कि आप पाकिस्तान में हैं या भारत में। जबकि यूरोप या अमेरिका दूसरी दुनिया लगता है।