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किडनी कांड से दिल्ली में हलचल, निजी अस्पतालों पर लटकी तलवार

Mon, 10 Jun 2019 04:56 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
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kidney racket
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देश के सबसे बड़े किडनी कांड खुलासे ने दिल्ली में हलचल मचा दी है, लेकिन दिल्ली और केंद्र सरकार इस मामले पर अभी खामोश हैं। पुष्पवती सिंघानिया अस्पताल के सीईओ डॉ. दीपक शुक्ला की गिरफ्तारी के बाद कई निजी अस्पतालों पर तलवार लटकती नजर आ रही है। 

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एक दर्जन से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार करने वाली कानपुर पुलिस ने पीएसआरआई के बाद अब फोर्टिस अस्पताल को रडार पर लिया है। अभी तक सबसे ज्यादा अंग प्रत्यारोपण का दावा करने वाले निजी अस्पताल भी जांच के दायरे में लाए जा सकते हैं। इन अस्पतालों के न सिर्फ कोर्डिनेटर, बल्कि प्रत्यारोपण की मंजूरी देने वाली समितियों तक से पुलिस जांच कर सकती है।

दिल्ली के कुछ डॉक्टरों की मानें तो, पीएसआरआई अस्पताल की तरह और भी अस्पतालों के कारनामे उनके रिकॉर्ड में उपलब्ध हो सकते हैं। इसलिए पुलिस को इन अस्पतालों के अधिकारियों के साथ मौजूदा दस्तावेज और प्रत्यारोपण की बैठक के दौरान बनाई जाने वाली वीडियो की जांच भी करनी चाहिए।  
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दरअसल, दिल्ली के निजी अस्पताल अंग प्रत्यारोपण को लेकर खासा चर्चित हैं। दिल्ली के पीएसआरआई अस्पताल में साल 2004 से किडनी प्रत्यारोपण हो रहा है। अस्पताल की वेबसाइट पर दावा किया गया है कि अब तक उनके यहां हजारों प्रत्यारोपण किए जा चुके हैं। कुछ इसी तरह के दावे और भी निजी अस्पताल अपनी वेबसाइट्स पर कर रहे हैं।

आयुष्मान पर लड़ने वाले अब चुप क्यों?

एम्स के एक वरिष्ठ सर्जन का कहना है कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री और दिल्ली के मुख्यमंत्री आयुष्मान भारत पर लड़ रहे हैं। राजनीति के लिए एक-दूसरे के खिलाफ सोशल मीडिया भर दिया है, लेकिन अंगों के इस अंतरराष्ट्रीय गोरखधंधे पर सब चुप हैं। इसके पीछे वजह ये भी है कि निजी अस्पतालों के साथ राजनीतिक नेताओं की दखलअंदाजी होती है।

आईएमए भी खामोश

देश के सबसे बड़े किडनी कांड में लगातार नए चेहरे सामने आ रहे हैं। सरकारी महकमे से लेकर चिकित्सीय क्षेत्र के संगठन तक चुप हैं। इस बाबत जब इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के महासचिव डॉ. आरवी असोकन से पूछा गया- ‘क्या आईएमए को किडनी कांड के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए?’ तो इस पर उन्होंने स्पष्ट कहा कि वे हिंदी भाषा नहीं समझते हैं। 

देश के सभी राज्यों में करीब 3 लाख से अधिक डॉक्टरों के इस संगठन में बतौर राष्ट्रीय महासचिव की जिम्मेदारी संभाल रहे डॉ. असोकन से जब चिकित्सीय वर्ग की खामोशी पर सवाल किया गया तो उन्होंने जवाब नहीं दिया। 

वहीं, आईएमए के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. शांतनु सेन ने कहा कि वे कहीं बाहर हैं, या तो एक सप्ताह बाद बात करें या फिर सोमवार सुबह। ऐसे में बड़ा सवाल है कि चिकित्सीय वर्ग की हर छोटी से छोटी परेशानी को बड़ी मुहिम देने वाला संगठन किडनी कांड जैसे गोरखधंधे पर चुप क्यों है?

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