आखिर ग्रैप होता क्या है?
पिछले कुछ वर्षों में देश की राजधानी दिल्ली अक्तूबर-नवंबर के महीनों में गैस चैंबर बनती रही है। इस समय पर हवा की गुणवत्ता बताने वाला वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) 'खतरनाक' श्रेणी में बना रहता है जिससे लोगों के बीमार होने का भी खतरा बना रहता है। इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए 2 दिसंबर 2016 में एमसी मेहता बनाम भारत संघ के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। आदेश के अनुसार, विभिन्न वायु गुणवत्ता सूचकांक के तहत कार्यान्वयन के लिए ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान यानी ग्रैप तैयार किया गया है।
राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता सूचकांक में एक्यूआई की कई श्रेणियों में शामिल किया गया है जिसमें मध्यम और खराब, बहुत खराब और गंभीर शामिल हैं। 'गंभीर+ या आपातकालीन' की एक नई श्रेणी बाद में जोड़ी गई है। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को पर्यावरण प्रदूषण (रोकथाम और नियंत्रण) प्राधिकरण के जरिए ग्रैप के कार्यान्वयन के लिए अधिसूचित किया गया है।
ग्रैप कार्य योजना में कितने चरण होते हैं?
-ग्रैप को दिल्ली एनसीआर में प्रतिकूल वायु गुणवत्ता के 4 विभिन्न चरणों के हिसाब से बांटा गया गया है। ग्रैप का चरण-l उस वक्त लागू होता है, जब दिल्ली में AQI का स्तर 201-300 के बीच होता है।
-ग्रैप का दूसरा चरण उस परिस्थिति में प्रभावी होता है, जब राजधानी में वायु गुणवत्ता सूचकांक 301-400 के बीच 'बहुत खराब' मापा जाता है। चरण II के तहत कार्रवाई एक्यूआई के 301-400 के अनुमानित स्तर तक पहुंचने से कम से कम तीन दिन पहले शुरू की जाती है।
-चरण III 'गंभीर' वायु गुणवत्ता के बीच लागू किया जाता है। इस वक्त दिल्ली में एक्यूआई 401-450 के बीच होता है। ग्रैप के चरण III के तहत कार्रवाई एक्यूआई के 400 से अधिक के अनुमानित स्तर तक पहुंचने से कम से कम तीन दिन पहले शुरू की जाती है।
-ग्रैप कार्य योजना का अंतिम और चरण IV 'गंभीर +' वायु गुणवत्ता की परिस्थिति में लागू किया जाता है। इस दौरान दिल्ली में AQI स्तर 450 से ज्यादा होना चाहिए। दूसरे और तीसरे चरण की तरह चरण IV के तहत कार्रवाई एक्यूआई के 450 के अनुमानित स्तर तक पहुंचने से कम से कम तीन दिन पहले ही शुरू की जाती है।