लोगों की कमजोर प्रतिरोधक क्षमता के कारण देश में रीढ़ की हड्डी की टीबी के मामले बढ़ रहे हैं। अस्पताल में हर माह औसतन दस रोगी इससे पीड़ित पहुंचते हैं, जिनमें से एक से दो को ऑपरेशन की जरूरत पड़ती है। ऑपरेशन के बाद रोगी ठीक हो जाते हैं लेकिन उन्हें 18 माह तक नियमित रूप से दवा लेनी पड़ती है।
सेक्टर-62 स्थित फोर्टिस अस्पताल में शुक्रवार को रीढ़ की हड्डी की टीबी विषय पर एक प्रेसवार्ता आयोजित की गई। इस दौरान अस्पताल के न्यूरो और स्पाइन सर्जन डॉ. राहुल गुप्ता ने कहा कि सांस के जरिये टीबी का जीवाणु खून में और फिर रीढ़ की हड्डी में पहुंच जाता है।
इससे वहां की हड्डी कमजोर हो जाती है। हड्डी में दबाव के कारण मवाद शरीर में फैल जाता है। जब मवाद किसी जगह पर जमा हो जाता है, तो उसे एब्सेस कहते हैं। स्पाइनल कॉर्ड दबने से व्यक्ति की हाथ पैर चलाने की ताकत खत्म हो जाती है। फेफड़ों और दिल पर भी इसका असर पड़ता है।
एक साल से बच्चे से लेकर बुजुर्गों तक में यह बीमारी हो सकती है। पौष्टिक तत्वों से भरपूर खानपान से शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाई जा सकती है।