दिल्ली सरकार के अस्पतालों में दवा की खरीद में हुई कथित अनियमितता को लेकर मुख्य सचिव विजिलेंस ने स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग सचिव को पत्र लिखकर अस्पतालों से मानक आधार पर खरी नहीं उतरीं सभी दवाओं को वापस लेने का निर्देश दिया है।
पत्र में कहा गया है कि दिल्ली औषधि परीक्षण प्रयोगशाला द्वारा पेश समेत अन्य रिपोर्ट में पाया गया कि कई कंपनियां मानक गुणवत्ता वाली नहीं हैं। जिनसे दवाओं की खरीद हुई है। सभी दवाएं जो निर्धारित मानदंडों में विफल रही हैं, उनकी तुरंत मात्रा निर्धारित की जानी चाहिए और युद्धस्तर पर कानून की उचित प्रक्रिया के अनुसार 48 घंटे के भीतर जब्त की जानी चाहिए। इतना ही नहीं ऐसी कंपनियों को कोई और भुगतान नहीं किया जाता है।
पत्र में मुख्य सचिव विजिलेंस ने यह भी इंगित किया है कि सभी असफल दवाओं की तुरंत पहचान की जाए और उन सभी अस्पतालों के स्टॉक से हटा दिया जाए। यह भी स्पष्ट करें कि इन दवाओं की खरीद एवं आपूर्ति कब से की जा रही है। यह भी स्पष्ट करने को कहा गया है कि इन कंपनियों और निर्माताओं को अब तक कितना भुगतान किया गया है और कितना भुगतान लंबित है।
इसके अलावा दवाओं की खरीद से संबंधित सभी दस्तावेजों के साथ-साथ निविदा दस्तावेज और उससे संबंधित फाइलों को तुरंत अपने कब्जे में लें और उनकी मूल प्रति सतर्कता निदेशालय को उपलब्ध कराएं। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग सचिव अगले 48 घंटों में की गई कार्रवाई रिपोर्ट प्रस्तुत करें।
परीक्षण में विफल रही दवा होंगी वापस
उपराज्यपाल वीके सक्सेना द्वारा मामले की सीबीआई जांच की सिफारिश करने के एक दिन बाद दिल्ली सरकार के सतर्कता निदेशालय ने गुणवत्ता मानक परीक्षण में विफल रही दवाओं को वापस लेने के लिए स्वास्थ्य विभाग को पत्र लिखा है। सक्सेना ने दिल्ली सरकार के अस्पतालों में गुणवत्ता मानक परीक्षण में विफल और जीवन को खतरे में डालने की क्षमता वाली दवाओं की कथित आपूर्ति की जांच की सिफारिश की थी।
अधिकारियों के अनुसार जो दवाएं घटिया गुणवत्ता की पाई गईं उनमें फेफड़ों और मूत्र पथ के संक्रमण के इलाज के लिए इस्तेमाल की जाने वाली महत्वपूर्ण जीवन रक्षक एंटीबायोटिक्स सेफैलेक्सिन शामिल हैं। उन्होंने कहा कि फेफड़ों, जोड़ों और शरीर में सूजन को ठीक करने के लिए एक स्टेरॉयड डेक्सामेथासोन, मिर्गी-विरोधी और चिंता-विरोधी मनोरोग दवा लेवेतिरसेटम और उच्च रक्तचाप-रोधी दवा एम्लोडेपिन भी शामिल है। सतर्कता निदेशालय ने स्वास्थ्य सचिव को यह सुनिश्चित करने के लिए भी कहा है कि ऐसी दवाओं के लिए फर्मों को कोई भुगतान नहीं किया जाए। पत्र में यह भी स्पष्ट करने की मांग की गई है कि इन दवाओं की खरीद और आपूर्ति कब की जा रही है।