सर्वे पर विशेषज्ञ की टिप्पणी
दिल्ली मेडिकल काउंसिल के सेक्रेटरी डॉक्टर गिरीश त्यागी ने अमर उजाला से कहा कि सर्वे से एक स्पष्ट परिणाम निकलता दिख रहा है कि राजधानी में कोरोना का असर काफी कम हो रहा है और भारी संख्या में लोग अनजाने में ही इसकी चपेट में आकर ठीक भी हो रहे हैं। दिल्ली को अपनी फास्ट टेस्टिंग और होम आइसोलेशन के विचार का लाभ मिला है जिसके कारण ज्यादा से ज्यादा लोगों को स्वस्थ करना संभव हुआ है। अभी यह आंकड़ा हर्ड इम्युनिटी का नहीं माना जा सकता, लेकिन यह स्पष्ट है कि दिल्ली तेजी से उस तरफ बढ़ रही है।
क्या सीख सकते हैं अन्य राज्य
एक तरफ जहां दिल्ली में कोरोना काफी हद तक नियंत्रण में आ गया है, वहीं देश में यह बेहद तेजी से आगे बढ़ रहा है। देश में कोरोना के नए मामले 70 हजार प्रतिदिन तक पहुंच गए हैं तो मौत का आंकड़ा भी कई बार हजार प्रति दिन से ऊपर पहुंच गया है। डॉक्टर गिरीश त्यागी के मुताबिक ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि अब देश में टेस्टिंग क्षमता में लगातार बढ़ोतरी की जा रही है। अब यह आठ लाख टेस्ट प्रतिदिन से भी आगे निकल गई है। यही कारण है कि अब तक जिन मामलों का पता नहीं चल रहा था, वे भी अब सामने आ रहे हैं।
उन्होंने कहा कि दिल्ली का फास्ट कोरोना टेस्टिंग मॉडल ही देश को इस संकट से बचाने में मदद कर सकता है। इसके आलावा मास्क लगाना और शारीरिक दूरी बनाए रखने के जरिए ही इससे बचा जा सकता है। चूंकि कई देशों में इसके लौटने की भी खबरें आई हैं, ऐसे में देश के लोगों को संक्रमण के प्रति लापरवाह नहीं होना चाहिए।
सीरो सर्वे 2.0 के महत्वपूर्ण परिणाम
सीरो सर्वे में 29.1 फीसदी लोगों में ये एंटीबॉडीज पाए गए हैं। दिल्ली की अनुमानित आबादी दो करोड़ के करीब है। इस प्रकार यह आंकड़ा लगभग 58-60 लाख तक पहुंचता है। इसका सामान्य अर्थ निकाला जा सकता है कि लगभग हर तीसरे व्यक्ति को कोरोना संक्रमण हो चुका है और वे ठीक भी हो चुके हैं। कई इलाकों में संक्रमण से ठीक होने की दर 38 फीसदी तक भी पाई गई है।
सर्वे के मुताबिक उत्तर-पूर्व जिले में 29.6 फीसदी, दक्षिणी जिले में 27 फीसदी, दक्षिण-पूर्व में 33 फीसदी और नई दिल्ली में 24 फीसदी लोगों में कोरोना वायरस के प्रति एंटीबॉडीज मिली हैं। एंटीबॉडीज के मामले में अलग-अलग क्षेत्रों में पहले सर्वे और दूसरे सर्वे में 6 से 50 फीसदी तक की बढ़ोतरी हुई है। औसतन हर क्षेत्र में 25 फीसदी तक की बढ़ोतरी हुई है।
नार्थ-ईस्ट जिले में पहले 27.7 फीसदी लोगों में एंटीबॉडीज मिली थीं, इस बार यह बढ़कर 29.6 फीसदी तक पहुंच गया है। साउथ-ईस्ट में यह 22 फीसदी था, जो इस बार बढ़कर 33 फीसदी हो गया है।
कम उम्र के बच्चों में स्थिति ज्यादा मजबूत
28.3 फीसदी पुरुषों और 32.2 फीसदी महिलाओं में एंटीबॉडीज विकसित पाई गई हैं। 18 वर्ष से कम उम्र के 34.7 फीसदी बच्चों में रोग प्रतिरोधी एंटीबॉडीज विकसित मिली हैं। 18 वर्ष से 50 वर्ष के वर्ग के 28.5 फीसदी लोगों में और 50 वर्ष से ऊपर के 31.2 प्रतिशत लोगों में एंटीबॉडीज विकसित हो चुकी हैं।
उम्मीद से कम
सरकार ने माना है कि उसे उम्मीद थी कि इस बार सर्वे में 50 फीसदी के करीब लोग एंटीबॉडीज के साथ पाए जाएंगे, जो कोरोना की लड़ाई में मजबूत हथियार हो सकता था। फिलहाल ऐसा नहीं हुआ है। अभी इसे हर्ड इम्युनिटी (सामुदायिक रोग प्रतिरोधी क्षमता) के स्तर का नहीं माना गया है। हर्ड इम्युनिटी के लिए न्यूनतम 40-50 फीसदी लोगों में रोग प्रतिरोधी एंटीबॉडी मिलना अनिवार्य माना जाता है।
सर्वे का तरीका
मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज के एक विशेषज्ञ के नेतृत्व में किए गये इस सर्वे में दिल्ली के हर वर्ग के लोगों के सैंपल लिए जाने का दावा किया गया है। सर्वे एक अगस्त से सात अगस्त के बीच किए गए थे। इसके लिए दिल्ली के अलग-अलग इलाकों से 15,300 सैंपल लिए गए थे।
पिछले सर्वे में सैंपल साइज 21387 रखा गया था। ये सर्वे हर माह कराए जाएंगे। सर्वे में कितने लोगों के सैंपल लेने हैं, ये सरकार के विशेषज्ञ तय करते हैं। सितंबर महीने में भी एक तारीख से सीरो सर्वे किए जाएंगे। सर्वे में 18 वर्ष से कम आयु के 25 फीसदी लोगों का सैंपल लिया गया था। लगभग 50 फीसदी सैंपल 18 वर्ष से 50 वर्ष के लोगों के लिए गए थे। शेष सैंपल 50 वर्ष से अधिक आयु के लोगों के लिए गये थे।
एंटीबॉडीज मिलने का अर्थ
क्या कोरोना संक्रमण की चपेट में एक बार आ चुका व्यक्ति स्वस्थ होने के बाद दोबारा कोरोना की चपेट में आ सकता है? इस पर कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे कई मामले सामने आये हैं जहां एक बार कोरोना संक्रमित हो चुका व्यक्ति फिर से कोरोना पॉजिटिव होता हुआ पाया गया है। लेकिन एक बार इलाज होने के बाद एंटीबॉडीज विकसित हो जाने के बाद यह उसके शरीर में तीन महीने से छह महीने तक रह सकता है और इस दौरान उसके दोबारा कोरोना की चपेट में आने की संभावना नहीं रहती।
इसके आलावा एंटीबॉडीज के खत्म हो जाने के बाद भी कोरोना पीड़ित के शरीर में बन चुके टी-शेल उसे दुबारा कोरोना की चपेट में आने से बचाते हैं। लेकिन यह भी सच है कि इन तमाम विचारों के बाद भी कई लोग दोबारा कोरोना की चपेट में आ रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि इसकी व्याख्या ‘केस टू केस’ के आधार पर ही की जा सकती है। विदेश में भी कई जगह कोरोना की दूसरी लहर आने की बात कही गई है। यह कोरोना संक्रमण के लिहाज से बेहद चिंताजनक पहलू माना जा रहा है।