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संयोग से राजनीति में आईं शीला दीक्षित, मुड़कर नहीं देखा पीछे, ससुर ने बदली किस्मत

Sat, 20 Jul 2019 08:26 PM IST
Vikas Kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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sheila dikshit - फोटो : twitter
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शीला दीक्षित संयोगवश राजनीति में आई थीं, लेकिन फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। उनके ससुर उमाशंकर दीक्षित एक समाजसेवी थे और स्वतंत्रता आंदोलन में भाग भी लिया। बाद में वह इंदिरा गांधी की सरकार में कैबिनेट मंत्री बने। इस दौरान शीला दीक्षित अपने ससुर की कानूनी सहायता करती थीं। 

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यह बात जब इंदिरा गांधी को पता चली तो उन्होंने उनकी प्रशासनिक क्षमता को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र कमिशन के दल का सदस्य के तौर पर नामित किया जो महिलाओं का प्रतिनिधित्व कर सके। बस यहीं से शीला दीक्षित के राजनीतिक जीवन की शुरुआत हुई। 1970 के दशक में वह युवा महिला मोर्चा की अध्यक्ष बनाई गई। 1984 से 1989 तक शीला उत्तर प्रदेश के कन्नौज सीट से लोकसभा सदस्य रहीं। इस दौरान उन्होंने लोकसभा इस्टीमेट कमिटी की सदस्य के रूम में भी काम किया। 

महिलाओं की स्थिति को लेकर उन्होंने 1984-89 के दौरान संयुक्त राष्ट्र आयोग में भारत का प्रतिनिधित्व किया। 1986 से 1989 के दौरान शीला ने केंद्रीय मंत्री के रूप में काम किया और दो पीएमओ में राज्यमंत्री संसदीय कार्य मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाली। 1990 में उन्होंने महिलाओं के खिलाफ अत्याचार को लेकर आंदोलन किया था। 1998 में वह दिल्ली की मुख्यमंत्री बनीं और लगातार करीब 15 साल (2013) तक काबिज रहीं। 1998 और 2003 में वह गोल मार्केट विधानसभा सीट से विधायक चुनी गईं। 
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इसके बाद 2008 में  नई दिल्ली सीट से विधानसभा के लिए चुनी गई। वर्ष 2015 में आम आदमी पार्टी के हाथों दिल्ली में करारी हार मिलने के बाद शीला दीक्षित ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया। 2014 में उन्हें केरल का राज्यपाल नियुक्त किया गया, लेकिन कुछ महीनों बाद उन्हें इस्तीफा देना पड़ा।  
 

शिक्षा के क्षेत्र में शीला 

शीला दीक्षित का जन्म 31 मार्च 1938 को पंजाब के कपूरथला में हुआ था। उन्होंने दिल्ली के कॉन्वेंट ऑफ जीसस एंड मैरी स्कूल से पढ़ाई की और फिर दिल्ली यूनिवर्सिटी के मिरांडा हाउस कॉलेज से मास्टर्स ऑफ आर्ट्स की डिग्री हासिल की। शीला की शादी उत्तर प्रदेश के आईएएस अधिकारी विनोद दीक्षित से हुई। विनोद दीक्षित कांग्रेस के कद्दावर नेता व बंगाल के पूर्व राज्यपाल उमाशंकर दीक्षित के बेटे थे। मिरांडा हाउस से पढ़ाई के दौरान ही उनकी राजनीति का सफर शुरू हो गया था।  
 
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पार्टी में पैठ बनती चली गईं 

शीला दीक्षित अपनी काम की बदौलत कांग्रेस पार्टी में पैठ बनाती चली गईं। गांधी परिवार से उनका काफी करीबी रिश्ता था। 1998 में शीला दीक्षित प्रदेश कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं। 1998 में ही लोकसभा चुनाव में शीला दीक्षित कांग्रेस की टिकट पर पूर्वी दिल्ली से चुनाव लड़ीं, लेकिन भाजपा के लाल बिहारी तिवारी से हार का सामना करना पड़ा। बाद में वह मुख्यमंत्री बनीं। शीला दीक्षित गोल मार्केट क्षेत्र से 1998 और 2003 में विधायक चुनी गईं। इसके बाद 2008 में नई दिल्ली क्षेत्र से चुनाव लड़ा।
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