कौशांबी में रहने वाली कीर्ति जैसे तैसे नवीं कक्षा तक पहुंची, लेकिन पिता की कम आय के आगे हार मानकर घर बैठने के बजाए कीर्ति ने संघर्ष का रास्ता चुना और आज सीए की पढ़ाई के साथ दिल्ली में जॉब भी कर रही हैं।
शीशा काटकर घर के लिए राशन जुटाने वाले पिता की संतान कीर्ति छह भाई बहिनों में तीसरे नंबर की हैं। नवीं के बाद जब कीर्ति ने आगे पढ़ने की इच्छा जताई तो पिता ने रुपया न होने की बात कही।
कीर्ति बताती हैं कि, लेकिन उसी पल पिता ने हौसला भी दिया कि अगर पढ़ने के लिए कीर्ति कुछ काम कर सके तो वे उसका पूरी तरह सहयोग करेंगे।