दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिल्ली विधानसभा के पूर्व सचिव सिद्धार्थ राव की बर्खास्तगी के आदेश को बरकरार रखा है। अदालत ने कहा कि उनकी नियुक्ति उपयुक्त नियुक्ति प्राधिकारी द्वारा नहीं की गई। अदालत ने स्पष्ट किया कि दिल्ली की विधान सभा में कोई अलग सचिवीय संवर्ग नहीं है, जिससे अध्यक्ष या किसी प्राधिकरण के लिए सदन सचिवालय में नियुक्तियां करना गैरकानूनी है।
न्यायमूर्ति चंद्र धारी सिंह ने कहा कि याचिकाकर्ता को एक गैर-मौजूद पद पर विशेष कार्य अधिकारी (ओएसडी) के रूप में नियुक्त किया गया था। ओएसडी के रूप में परिवीक्षा अवधि पूरी होने के बाद उन्हें तुरंत संयुक्त सचिव के पद पर समाहित कर लिया गया और एक वर्ष के भीतर वेतनमान में सभी उन्नयन के साथ सचिव का प्रभार दिया गया।
अदालत ने कहा कि ओएसडी के रूप में प्रतिनियुक्ति संयुक्त सचिव के पद पर आमेलन और सचिव के पद पर पदोन्नति के लिए सक्षम प्राधिकारी से कोई अनुमोदन नहीं लिया गया, जिस कारण उनकी नियुक्ति अवैध है। अदालत ने कहा कि दिल्ली विधान सभा में दिल्ली के उपराज्यपाल की अनुमति से पदों का सृजन किया जा सकता है।
उन्होंने कहा भारत के संविधान का अनुच्छेद 187 अलग सचिवीय कर्मचारियों के लिए राज्यों पर लागू होता है, लेकिन इसे दिल्ली में लागू नहीं किया जा सकता है क्योंकि यह एक केंद्र शासित प्रदेश है। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि अनुच्छेद 187 दिल्ली विधानसभा पर लागू नहीं होता है।
अदालत ने कहा कि दिल्ली विधान सभा में दिल्ली के उपराज्यपाल की अनुमति से पदों का सृजन किया जा सकता है, जो संविधान के अनुच्छेद 309 के तहत इस संबंध में शक्तियों के प्रत्यायोजन के आधार पर सक्षम प्राधिकारी हैं।