दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में नोटा वोट ने छात्र संगठनों की नींद उड़ा रखी है। साल 2018 के नतीजों में 27729 विद्यार्थियों ने नोटा बटन दबाया था, जो छात्र संगठन आइसा और सीवाईएसएस के गठबंधन को मिले वोट से भी ज्यादा था। बीते तीन साल से नोटा वोटों की संख्या बढ़ रही है। इस ट्रेंड से घबराए छात्र संगठन रणनीति के तहत इससे पार पाने की जुगत लड़ा रहे हैं।
विद्यार्थियों से अपील की गई है कि वह नोटा के बजाय सही उम्मीदवार का चयन करें। वर्ष 2016 में पहली बार डीयू में नोटा की शुरुआत की गई थी। पहली बार में ही 17712 वोट नोटा को चले गए, जबकि 2017 में इसकी संख्या बढ़कर 29765 हो गई।
इसी साल आइसा को चारों पदों पर नोटा से भी कम 29354 वोट मिले थे। 2018 में 27729 विद्यार्थियों ने नोटा बटन दबाया। इससे आइसा व सीवाईएसएस के गठबंधन को ज्यादा नुकसान हुआ। क्योंकि, इन दोनों संगठनों को नोटा से भी कम 26852 वोट मिले थे। नोटा से पार पाने के लिए छात्र संगठनों ने छात्रों से नोटा की जगह बेहतर प्रत्याशी को वोट देने की अपील की है।
एबीवीपी के दिल्ली प्रदेश मीडिया प्रभारी आशुतोष सिंह ने कहा कि प्रचार के दौरान छात्रों से अपील की गई है कि वह बेहतर उम्मीदवार का चयन करें। नोटा का इस्तेमाल करने से उनका वोट खराब चला जाता है। इससे संगठन को भी नुकसान होता है। नोटा का इस्तेमाल करने से गलत प्रत्याशी के चयन की संभावना बन जाती है।
लिहाजा, विद्यार्थी जिसे बेहतर समझें, उसे वोट जरूर करें। एनएसयूआई राष्ट्रीय मीडिया इंचार्ज नीरज मिश्रा ने कहा कि कॉलेजों में छात्रों से आग्रह किया गया है कि वह नोटा की बजाए जो उम्मीदवार सही हो उसे वोट जरूर करें। नोटा का बटन दबाकर वह अपने मताधिकार के अधिकार को खत्म कर रहे हैं।