प्रदेश की सबसे पुराना नगर निगम इन दिनों बदहाली से जूझ रहा है। एक महीने के वेतन आदि का खर्च पूरा हो नहीं पाता कि अगले महीने का भार फिर आ जाता है। ऐसे में निगम अधिकारी से लेकर कर्मचारी सब परेशान हैं। पैसों की व्यवस्था हो कहां से इसके लिए अधिकारियों में माथापच्ची हो रही है।
आपको यकीन नहीं होगा कि निगम कर्मचारियों की लापरवाही के चलते निगम के आय और व्यय में 50 फीसदी का अंतर पैदा हो गया है। ऐसे में स्मार्ट सिटी के लिए 1600 करोड़ रुपये जुटाना निगम के लिए किसी चुनौती से कम नहीं होगा।
ज्ञात हो कि नगर निगम के तीनों जोन में स्थायी, डेलीवेज और आउट सोर्सिंग के 7000 के करीब कर्मचारी कार्यरत हैं। इनके वेतन और रिटायर्ड कर्मचारियों के पेंशन आदि पर हर महीने करीब 16 करोड़ रुपये की जरूरत पड़ती है।
इसके अलावा बिजली बिल 8 करोड़, अधिकारियों व अन्य वाहनों के पेट्रोल व डीजल पर एक करोड़ तथा अन्य खर्च पर करीब 4 करोड़ रुपये खर्च होते हैं।