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छ: वजहें जिसने किरण-केजरीवाल को किया अलग

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अन्ना हजारे की वो टीम जो भ्रष्टाचार के आंदोलन के लिए उस वक्त टूट गई जब उन्होंने कहा कि, ‘यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि टीम अलग हो गई है. मैं किसी पार्टी या समूह में शामिल नहीं होऊंगा।
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ये उन अतीत के पन्नों की बात है जब केजरीवाल और किरण बेदी के मतभेद इस कदर बढ़ गए थे कि अन्ना को इस फैसले के अलावा कोई और कदम नहीं सूझा।

किरण और केजरीवाल के अलगाव की ये कहानी सिर्फ यहीं से शुरु नहीं हुई थी बल्कि ये तो महज अंजाम था। आखिर वो कौन सी बातें थीं जिन्होंने इन दोनों को ही अलग-अलग रास्तों पर जाने पर मजबूर किया।

ये हैं वो छह वजहें जिनसे अलग हुई राहें

1- अन्ना आंदोलन का वो वक्त याद कीजिए जब अन्ना अनशन पर थे, और मंच का संचालन केजरीवाल के हाथों में था। हर तरफ केजरीवाल ही अन्ना आंदोलन को दिशा देते हुए दिखाई दे रहे थे। उस वक्त केजरीवाल से किरण बेदी की मुखालफत पहली बार सामने आई थी। किरण बेदी आंदोलन महज अन्ना के आस-पास ही दिखाई दे रही थीं। सारे मामलों में दखल सिर्फ केजरीवाल का ही था।

2- आंदोलन आगे बढ़ा और केन्द्र सरकार ने अन्ना के आंदोलन के आगे घुटने टेक दिए तो उस वक्त सरकार से बात करने के लिए एक कमेटी का गठन किया गया था, जिसमें किरण बेदी का नाम शामिल नहीं था। इस बात से किरण बेदी नाराज नजर आई। हालांकि इस बात की शिकायत उन्होंने अन्ना से की थी, जिसके बाद इस कमेटी में उनका नाम अन्ना के कहने पर शामिल किया गया था।

इन मामलों में शामिल नहीं थी किरण

3-तीसरी सबसे बड़ी किरण की नाराजगी की वजह लोकपाल बिल की ड्राफ्टिंग कमेटी में टीम के सदस्यों के नाम पर हुई। इसमें प्रशांत भूषण, शांति भूषण, संतोष हेगड़े और अरविंद केजरीवाल का नाम शामिल था। इस कमेटी में अन्ना की टीम की तरफ से किरण बेदी का नाम शामिल नहीं किया गया था।

इस मामले के बाद किरण बेदी को आंदोलन में अपना ओहदा छोटा नजर आने लगा था। हालांकि कभी उन्होंने इस बात का खुलकर सबके सामने जिक्र नहीं किया, लेकिन उनकी नाराजगी साफ दिखाई दे रही थी।

4- चौथी महत्वपूर्ण वजह अन्ना ने मुम्बई में दूसरे बड़े आंदोलन का ऐलान किया, जो कि कालेधन को लेकर था। लेकिन ये आंदोलन पूरी तरह फ्लॉप हो गया। इस आंदोलन ने कई अहम सवाल खड़े कर दिए। इस आंदोलन के बाद किरण बेदी और केजरीवाल दोनों की नाराजगी खुलकर सामने आने लगी थी। किरण केजरीवाल के पक्ष में नहीं थी।
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राजनीतिक पार्टी बनाने की वजह से दूर हुई किरण

5-आंदोलन के अगले कदम को लेकर बंद कमरे में नौ घंटे तक चली बैठक के बाद अन्ना और केजरीवाल के रास्ते अलग हो गए थे, लेकिन कहा गया था कि लम्बे समय से अन्ना की टीम में केजरीवाल और किरण के बीच अलग-अलग सोच की वजह से मतभेद चल रहा था। सियासी पार्टी के नाम पर अन्ना टीम के दो टुकड़े हो गए।

कहा जा रहा थी कि केजरीवाल सियासी पार्टी बनाना चाहते थे और अन्ना इस फैसले के खिलाफ थे, जिस वजह से इस टीम के दो टुकड़े हो गए। एक पाले में केजरीवाल का सियासी धड़ा तो दूसरी तरफ समाजसेवियों का जमवाड़ा। इस टूट में अन्ना का साथ देने वालों में अहम नाम किरण बेदी का था। किरण बेदी ने केजरीवाल से मुखालफत का ये मौक नहीं गंवाया और दोनो बिल्कुल अलग राहों पर चले गए।

6-सियासी पार्टी बनाने और दिल्ली चुनावों में आंदोलन के बाद किरण बेदी किसी भी प्रकार से केजरीवाल के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों में शामिल नहीं हुई। तब ये साफ हो गया कि ये दोनो साथी अब दो अलग-अलग रस्सियों के अलग-अलग छोर बन गए हैं। उस वक्त एक सवाल उठ रहा था कि किरण बेदी सिर्फ कांग्रेस को निशाना बनाकर बीजेपी को मदद करना चाहती हैं। किरण इससे इंकार करती रही थीं।
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