फरीदाबाद की यह रामलीला अन्य प्रदेशों और जिलों से थोड़ी भिन्न है। यहां की पुरानी रामलीलाओं में उर्दू की खुशबू मिलती है। एनएच-एक स्थित विजय रामलीला एवं सेक्टर-15 की श्रद्धा रामलीला में दो समृद्ध भाषाओं और संस्कृतियों का मिलन होता है।
इनकी स्क्रिप्ट पाकिस्तान से आई हुई है। भारत-पाक विभाजन की त्रासदी झेलकर आए लोगों ने भले ही धन-दौलत, जमीन-जायदाद वहीं छोड़ दी हो लेकिन अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत को साथ ही रखा।
बंटवारे से पहले लोग पाकिस्तान के मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में भी रामलीला करते थे। लेकिन अधिकांश बातें उर्दू में हुआ करती थीं। यही स्क्रिप्ट विभाजन के साथ ही हिंदुस्तान आ गई। इसमें चौपाई की जगह शायरी है, जो दर्शकों पर गहरी छाप छोड़ती है।
चौपाई नहीं पढ़ी जाती हैं शेरो-शायरी
यहां की 62 साल पुरानी विजय रामलीला के निर्देशक विश्वबंधु शर्मा कहते हैं कि ‘हमारे पूर्वज कोहाट एवं डेरा इस्माइल खां से आए थे। वहां भी रामलीला होती थी। अधिकांश लोग उर्दू जानते और लिखते-पढ़ते थे।
इसलिए स्क्रिप्ट में शेरो शायरी खूब है। इसमें हमारे पूर्वजों की भावनाएं जुड़ी हुई हैं। देश की गंगा-जमुनी संस्कृति का मिलन है।’ यहां तो अक्सर रामलीला शुरू होने से पहले उस मंच पर कव्वाली का आयोजन होता रहता है।
सेक्टर-15 स्थित श्रद्धा रामलीला कमेटी के निर्देशक अनिल चावला कहते हैं कि शेरो-शायरी के कारण संवाद बोलना और याद करना आसान है। जवाहर नगर कैंप पलवल में लोग पाकिस्तान के डेरा गाजी खां नामक स्थान से आए थे।
वहां के टेकचंद, लखीराम, जेठाराम एवं अमरनाथ आदि रामलीला की पटकथा अपने साथ ले आए। लेकिन समय-समय पर यहां के मुताबिक उस स्क्रिप्ट में बदलाव किया गया। श्रीराम, लक्ष्मण, सीता, हनुमान जी, रावण एवं अंगद सहित कई किरदार शायरी के माध्यम से ही अपनी बात रखते हैं।
और राम ने कहा, 'मर गया लंका में भाई बेकफन'
-‘तूने ही मेरे लिए छोड़ा भाई प्यारा वतन/ लात मारी ऐश पर, छोड़े सभी साथी, सजन/ हाय! जब मैं अब अवध में जाऊंगा इस भाई बिन/ क्या कहूंगा मर गया लंका में भाई बेकफन...।।’ (रावण की सेना से लड़ते वक्त जब लक्ष्मण मेघनाद के ब्रह्मास्त्र से मूर्छित होते हैं तो परेशान श्रीराम कहते हैं)।
-ये भिखमंगों की बाते हैं जा मांगों भीख बाजारों से/सीता को लेना चाहते हो तो लेना तलवारों से...।। हो न अंधे इस कदर इस मोह के जंजाल में/एक दिन आना पड़ेगा, मौत के भी गाल में/इस रूखे ताबा पे होगी, मुर्दानी छाई हुई/तेरी शान होगी वक्त की ठोकर से ठुकराई हुई..। (अंगद-रावण संवाद)
खास बात
-पाकिस्तान से भारत आने के बाद लोगों ने पुरानी स्क्रिप्ट में समय के साथ बदलाव कर राधेश्याम जी एवं जसवंत सिंह टोहानवी की रामायण के अंश डाले।
-विभाजन की त्रासदी झेलकर आए लोगों में रामलीला के प्रति लगाव देखते हुए प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने विजय रामलीला कमेटी को उस वक्त एक हजार रुपये इसकी शुरुआत करने के लिए दिए थे। वह फरीदाबाद विकास बोर्ड के पहले चेयरमैन भी थे।
बंटवारे की त्रासदी, संघर्ष और कठिनाईयों के बीच न जाने कितने लोगों ने अपनों को खोया। सोना, चांदी, घर-द्वार, खेत-खलिहान छूट गए, लेकिन लोगों ने रामलीला मंचन की अपनी विरासत संजोए रखी। यह लोगों की अपनी संस्कृति के प्रति गहरे लगाव को दर्शाती है। इसीलिए कहते हैं गीत-संगीत और मंच को बार्डर नहीं रोक सकते।
-रामजी बाली, मशहूर रंगकर्मी