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Raksha Bandhan: पाकिस्तान में भाई, बहनों ने हिंदुस्तान में ढूंढी कलाई; यहां अटूट है मुंहबोले भाई-बहन का रिश्ता

Mon, 19 Aug 2024 01:12 PM IST
शाहरुख खान आशीष सिंह, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

भाई पाकिस्तान में है, बहनों ने हिंदुस्तान में कलाई ढूंढ ली। दिल्ली में मजनू का टीला स्थित हिंदू शरणार्थी कैंप में मुंहबोले भाई-बहन का रिश्ता अटूट है। 800 लोग शरणार्थी कैंप में रहते हैं। 
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मजनू का टीला स्थित हिंदू शरणार्थी कैंप में मुंहबोले भाई-बहन - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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पाकिस्तान में मेरे दो भाई हैं। दोनों छोटे हैं। करीब 13 साल पहले आखिरी बार उनकी कलाई में मैंने रक्षा सूत्र बांधा था। यह कहते हुए लता भाइयों संग बिताए पलों को याद कर भावुक हो जाती है। वह कहती हैं कि वहां सब कुछ था, लेकिन धर्म के नाम पर प्रताड़ना मिलती थी। लता वर्ष 2011 में पाकिस्तान के सिंध प्रांत से आकर दिल्ली के मजनू का टीला स्थित हिंदू शरणार्थी कैंप में रह रही हैं। 
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वह कहती हैं कि यहां भी उन्होंने राखी बांधने के लिए भाई की कलाई ढूंढ ली है। वह अब पड़ोस में रहने वाले दर्शन लाल को हर साल राखी बांधती हैं। कुरेदने पर बताती हैं कि लाल उनके भाई के अच्छे दोस्त हैं। ऐसे में वह अपने भाई का अक्स उनमें देखती हैं। यह कहानी केवल 30 वर्षीय लता की नहीं है, बल्कि कैंप में रहने वाली कई महिलाओं व युवतियों की है। 

जिन्होंने वक्त के साथ मुंहबोले बहन-भाई के बंधन को मजबूत किया है। यहां भाई-बहन का रिश्ता अटूट है। शरणार्थी कैंप में रहने वाले लोग बताते हैं कि पाकिस्तान में भी रक्षाबंधन का त्योहार हर्षोल्लास मनाया जाता है। लता बताती हैं कि एक बार जब उनकी तबीयत खराब हुई थी, तो लाल ही वह व्यक्ति हैं, जो उन्हें अस्पताल लेकर गए थे। 
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इसी तरह 50 वर्षीय रानी बताती हैं कि पाकिस्तान में उनके पांच भाई हैं। वहां से आने के बाद यहां भाइयों की याद हमेशा सताती है। दो भाइयों को तो उन्होंने गोद में खिलाया तक है। वह कहती हैं कि भाइयों की कमी तो खलती है, लेकिन यहां आकर भाई भी मिल गया है।

बहन पाकिस्तान भाई भारत में
शरणार्थी बताते हैं कि रक्षाबंधन से पहले पाकिस्तान के बाजारों में एक अलग ही रौनक देखने को मिलती है। बाजार में जबरदस्त भीड़ रहती है। कैंप में रहने वाले हिंदू शरणार्थियों में कई भाई भी ऐसे हैं जिनकी बहन पाकिस्तान में हैं। शरणार्थी शंकर लाल कहते हैं कि उनकी एक ही बहन है, जोकि वहीं रहती हैं।

वह बताते हैं कि रक्षाबंधन आता है, तो बहन की याद आने लगती है। लेकिन वह कहते हैं कि यहां भी मुंहबोली बहन हैं। जो हर वर्ष उन्हें राखी बांधने आती हैं। वह कहते हैं कि दो देशों के बीच की खाई को बहन-भाई के रिश्ते को पाट दिया है।

हर त्योहार धूमधाम से मनाया जाता है
साल 2011 में दर्जनों परिवार पाकिस्तान के सिंध से दिल्ली के मजनू का टीला इलाके में पहुंचे थे। इसके बाद वह अपना गुजर बसर सड़कों पर सामान बेचकर कर रहे हैं। कैंप में रहने वाले सोना दास ने बताया कि यहां पाकिस्तान से आए 200 से अधिक परिवारों के 800 के करीब लोग रहते हैं।

वह कहते हैं कि यहां हर त्योहार धूमधाम से मनाया जाता है। बच्चों ने अपने हाथों में पहले ही राखी बांध ली है। हर ओर खुशी का माहौल है। लेकिन, वह बस्ती की परेशानी को उजागर करते हुए कहते हैं कि अगर यहां सरकार पानी-बिजली की सुविधा दे तो अच्छा होगा।

रक्षाबंधन से पहले बहन ने लिवर दान कर बचाई भाई की जान
रक्षाबंधन से पहले बहन ने लिवर देकर भाई की जान बचाई। भाई लंबे समय से सिरोसिस से पीड़ित था। समस्या बढ़ने के बाद रोगी की जान बचाने के लिए अंग प्रत्यारोपण के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा। ऐसे में अंग देने में बहन आगे आई। प्रत्यारोपण के बाद भाई-बहन दोनों स्वस्थ हैं।

दक्षिणी दिल्ली स्थिति निजी अस्पताल में 43 वर्षीय भाई मुकेश अत्याधिक कमजोरी, पेट में सूजन और बार-बार इंटरनल ब्लीडिंग से परेशान होकर आया था। मरीज की हालत काफी खराब थी। जांच के बाद मरीज में सिरोसिस का पता चला। अस्पताल के सर्जन डॉ. मनोज गुप्ता ने बताया कि मरीज की स्थिति खराब थी।
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जान बचाने के लिए अंग प्रत्यारोपण ही एक  विकल्प था। परिवार को अंगदान के लिए कहा गया। मरीज के परिवार में उनकी वृद्ध मां और उनकी बड़ी बहन थी। अंगदान करने के लिए देहरादून निवासी उनकी बहन ने कोई हिचकिचाहट नहीं की। जब डॉक्टरों ने उपचार योजना को लेकर बहन से चर्चा की तो उन्होंने कहा कि वह अपने भाई को बचाना चाहती हैं।
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