मॉक ड्रिल में बचाव का प्रशिक्षण
तुगलकाबाद यार्ड महज एक उदाहरण है, एनडीआरएफ की बचाव टीमें, रेलवे सिविल डिफेंस और आरपीएफ के साथ में बचाव का प्रशिक्षण ले रही हैं। दुर्घटना संभावित क्षेत्रों में हादसे का परिदृश्य पैदा कर उससे बचाव की तरकीब ढूंढ रहे हैं। पलटे हुए कोचों में प्रवेश कर सबसे पहले यात्रियों की संख्या, कोच में उनके स्थान और उनके बाहर निकलने के विकल्पों का विश्लेषण मॉक ड्रिल में किया जा रहा है। जहां भी संभव हुआ, यात्रियों को कोच के अंदर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। मौके पर पहुंची एक्सीडेंट रिलीफ ट्रेन (एआरटी) टीमों ने यात्रियों को बाहर निकाला।
कोल्ड कटर का इस्तेमाल
दुर्घटना की स्थिति में कोल्ड कटिंग पद्धति अपनाई जा रही है। पिछली दुर्घटनाओं में देखा गया कि पलटे हुए कोच के ऊपर कई कोच चढ़ गए थे और यात्री उसी में दबे हुए थे। ऐसे में उन्हें कटर के माध्यम से निकाला गया लेकिन कोच में दबे हुए यात्रियों को नुकसान नहीं पहुंचे इसलिए कोल्ड कटर का इस्तेमाल किया जा रहा है। अन्य कटर से लोहे को काटने पर लोहा गर्म हो जाता है, तो दबे हुए व्यक्ति की मौत भी हो सकती है।
रेलवे अस्पताल भी अलर्ट मोड पर
किसी भी दुर्घटना की स्थिति में रेलवे के अस्पतालों को भी अलर्ट किया गया है। इसमें आभासी हादसे में मेडिकल टीमें सबसे पहले घायल यात्रियों की सूची तैयार करेगी। उनकी चोटों की स्थिति और उन अस्पतालों का विवरण रखेगी, जहां उन्हें आगे के उपचार के लिए भेजा जाएगा। हर घायल यात्री की जेब में उनकी पहचान के लिए नाम और रोगी के विवरण की एक पर्ची भी रखी जाएगी। इससे प्राथमिक उपचार देते समय या अस्पताल भेजते समय उनकी पहचान संभव हो सकेगी।
तुगलकाबाद यार्ड में मॉक ड्रिल से पता चला है कि रेलवे एनडीआरएफ और सिविल अधिकारियों की मदद से ऐसी दुर्घटनाओं से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है। रेलवे सुरक्षा बल यात्रियों की मदद में किसी से पीछे नहीं है। आगे भी सुरक्षा इंतजामों को परखने के लिए रेलवे इस तरह की मॉक ड्रिल करेगा। -अभिमन्यु सेठ, अपर मंडल रेल प्रबंधक, दिल्ली मंडल, उत्तर रेलवे