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मैं सरकार या तू सरकार की जंग में फंसे काम, असमंजस में अधिकारी

Mon, 12 Sep 2016 08:02 AM IST
अखिलेश कुमार/अमर उजाला, नई दिल्ली
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LG Najeeb Jung - kejri-sisodiya - फोटो : file photo
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दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल (केन्द्र) के बीच जंग में जनता के काम फंसते और पिछड़ने लगे हैं। उपराज्यपाल नजीब जंग की तरफ से गठित तीन सदस्यीय समिति ने फाइलों की खामियां ढूंढनी शुरू कर दी है। 
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वहीं, अधिकारी ऐसी कोई भी फाइल अपने पास नहीं रखना चाहते, जिसमें उपराज्यपाल की मंजूरी की जरूरत थी और नहीं गई है। अधिकारी उन नीति व फैसलों पर काम बढ़ाने से कतरा रहे हैं, जिसकी मंजूरी नहीं ली गई है। 

क्योंकि उपराज्यपाल की समिति जिम्मेदारी तय करने और खजाने से खर्च राशि वसूली पर भी काम कर रही है। दूसरी ओर, उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया विधानसभा के विशेष सत्र में वैट आयुक्त को तीन महीने की स्टडी लीव पर भेजने को मंजूरी दिए जाने पर वैट कलेक्शन घटने का अंदेशा जता चुके हैं।
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'आदेश की व्याख्या गलत करने का आरोप भी लगा रहे मंत्री'

arvind kejriwal
उच्च न्यायालय के आदेश की व्याख्या गलत करने का आरोप भी मंत्री लगा रहे हैं। सिसोदिया के साथ मंत्री सत्येंद्र जैन का भी कहना है कि जो नए अधिकारी उनके विभाग के सचिव बनाए गए हैं, वो मंत्री से मिलने तक नहीं आए। 

मोहल्ला क्लीनिक बनाने समेत कुछ अन्य कार्य अधिकारी की तरफ से रोके जाने पर सत्येंद्र जैन ने अधिकारियों को लिखित आदेश दिया है कि
सिर्फ वही काम रोकें, जिसके रोकने के आदेश उपराज्यपाल लिखित में दें।

उपराज्यपाल सचिवालय को करीब 450 फाइलें भेजी जा चुकी हैं। उनमें आप सरकार की तरफ से लगाए गए तमाम कंसल्टेंट, पदोन्नति, निगमों के गठन और एक्सपर्ट की नियुक्ति की फाइलें भेजी गई हैं। 

फिर सरकार के मनमाफिक अधिकारी हटाए जाने से शिक्षा विभाग में कमरे बनवाने, प्राइवेट स्कूल पर नकेल कसने, पीडब्ल्यूडी प्रोजेक्ट रुकने, अनाधिकृत कालोनी विकास कार्य पर असर पड़ने की आशंका आप सरकार लगातार जता रही है।
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जानिए किन मुद्दों पर फंसा ज्यादा पेंच

एलजी नजीब जंग - फोटो : अमर उजाला
इन फैसलों पर सवालिया निशान
दिल्ली सरकार के सूत्र बताते हैं झुग्गी पुनर्वास, मोहल्ला क्लीनिक, दवाई खरीद के लिए बना निगम, डीईआरसी चेयरमैन नियुक्ति, अनुबंधित कर्मचारियों को पक्का करने, दिल्ली बाल अधिकार संरक्षण आयोग (डीसीपीआर) के चेयरमैन विस्तार, महिला सुरक्षा पर गठित आयोग, तीर्थ यात्रा विकास समिति, विज्ञापन के लिए गठित शब्दार्थ, भूमि अधिग्रहण नियमों में बदलाव, कृषि भूमि जमीन सर्किल रेट वृद्धि समेत कई फैसलों को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है।

लंबी चलेगी सरकार कौन की लड़ाई
हाईकोर्ट ने उपराज्यपाल के अधिकार क्षेत्र को बड़ा बताकर सब कुछ उन्हीं के जिम्मे छोड़ा है तो आप सरकार ने 7 विशेष अनुमति याचिका सुप्रीम कोर्ट में डालकर चुनौती भी दी है। 

सुप्रीम कोर्ट ने बेशक उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक नहीं लगाई है, लेकिन विशेष याचिका स्वीकार करके 15 नवंबर को संविधान पीठ में मामला भेजा जाए या नहीं, इस पर सुनवाई की तारीख तय की है। मसलन, करीब दो महीने सरकार ऐसे ही चलेगी।

किन मुद्दों पर अधिक दिक्कत
.राजस्व वसूली में पिछड़ रही है सरकार।
.न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने का मामला उपराज्यपाल के पास लंबित, कमेटी को उपराज्यपाल ने अवैध बताकर फिर से मांगा था प्रस्ताव।
.न्यूनतम मजदूरी कानून को धता बताने वालों पर सख्ती का कानून में भी केंद्र सरकार की आपत्तियां उलझी हुई हैं।
.केंद्र सरकार को जो विधेयक विधानसभा से पास करके भेजे गए हैं, उसमें सरकार की परिभाषा बदलने की लड़ाई में फंसा है।
.सरकार के सिटीजन चार्टर विधेयक में भी सरकार की परिभाषा का मामला फंसा, पुराने ईएसएलए कानून में भी ढिलाई।
.अनधिकृत कॉलोनी नियमन के नए दिशा निर्देश, सरकारी जमीन पर बसी कॉलोनी में जुर्माना राशि और प्राइवेट जमीन पर बसी कॉलोनी में
विकास शुल्क लिए जाने को लेकर केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय और दिल्ली सरकार के बीच सहमति नहीं बन रही है।
.डीईआरसी अध्यक्ष नियुक्ति में भी उपराज्यपाल से अनुमति नहीं ली, उनकी तरफ से लोड बढ़ाने-घटाने का आदेश भी फंसा। पुराने बिजली बिल
माफीनामें की फाइल भी भेजी गई।
.डीसीपीसीआर में अध्यक्ष के सेवा विस्तार, दवा खरीद के लिए बने निगम में नियुक्तियां, डीडीसी में नियुक्ति, शब्दार्थ में नियुक्ति नियमित
किए जाने पर भी संशय।
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