- अदालत में जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सरकार के फैसले में दखल देने से इनकार किया
- न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद और न्यायमूर्ति रेनू भटनागर की खंडपीठ ने समीक्षा याचिका खारिज की
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार के उस फैसले में दखल देने से इन्कार कर दिया है, जिसके तहत निजी स्कूलों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) और वंचित समूहों के तहत प्रवेश लेने वाले छात्रों को यूनिफॉर्म खरीदने के लिए नकद राशि दी जाती है।
न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद और न्यायमूर्ति रेनू भटनागर की खंडपीठ ने एक समीक्षा याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि सरकार की यह नीति मनमानी, नहीं है। खंडपीठ ने कहा कि यूनिफॉर्म की माप लेना, सामग्री की खरीद, सिलाई और समय पर वितरण जैसी व्यावहारिक कठिनाइयों के कारण नकद सहायता देना उचित विकल्प है।दिल्ली सरकार ने जून 2025 में यह नीति लागू की थी। इसके तहत सहायता राशि सीधे लाभार्थी के खाते में डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) के माध्यम से भेजी जाती है। इससे पहले सरकार स्कूल यूनिफॉर्म खुद उपलब्ध कराती थी। एक गैर-सरकारी संगठन जस्टिस फॉर ऑल ने समीक्षा याचिका दायर कर तर्क दिया था कि बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई एक्ट) के तहत वास्तविक यूनिफॉर्म उपलब्ध करानी चाहिए, न कि नकद राशि। न्यायालय ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि नीतिगत फैसले में तब तक हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए जब तक कि वह विवेक को आहत न करे। हाईकोर्ट ने जनवरी 2026 के अपने पहले फैसले को भी दोहराया, जिसमें कहा गया था कि हर छात्र की माप लेकर अलग-अलग कपड़े मंगाना, सिलाई करवाना और सत्र शुरू होने से पहले वितरण करना व्यावहारिक रूप से असंभव है।