दिल्ली में कांग्रेस का नेतृत्व पूरी तरह से अल्पसंख्यक समुदाय के हाथ में है। प्रदेश कांग्रेस के दोनाें प्रभारी, प्रदेश अध्यक्ष, विधायक दल के नेता मुस्लिम व सिख समुदाय से संबंध रखते हैं। गत चुनाव में कांग्रेस के आठ विधायक जीते थे जिसमें छह अल्पसंख्यक समुदाय से थे।
ऐसे में कांग्रेस मुस्लिम समुदाय को छिटकने नहीं देना चाहती। यही वजह है कि पुरानी दिल्ली में मुस्लिमों के बड़े चेहरे शोएब इकबाल को पार्टी को शामिल कराया गया है। इन नेताओं की कोशिश भी यही है कि मुस्लिम मतदाता न बंटें। ऐसे में आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के हाथ कुछ और सीटें लग सकती हैं।
अहम है कि दिल्ली में मुस्लिम मतदाताओं की भागीदारी 14 फीसदी है। इसके अलावा कुछ सीटों पर सिख मतदाता भी फैसला देने की स्थिति में हैं। उसी को ध्यान में रखकर पार्टी अल्पसंख्यक नेताओं की अगुवाई में विधान सभा चुनाव में उतरने की तैयारी में है।
राजनीतिक विशेषज्ञों के मुताबिक ऐसे में भाजपा यह संदेश देने में कामयाब रही कि कांग्रेस दिल्ली में सिर्फ अल्पसंख्यकों को बढ़ावा देना चाहती है तो आगामी चुनाव में मतों के ध्रुवीकरण की स्थिति बनेगी।
क्या कहता है इतिहास
बताते चलें कि 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को आठ में से छह सीटें मुस्लिम बहुल सीटें की मिली थी। सदर बाजार में आप प्रत्याशी जीता जबकि भाजपा सिर्फ 796 वोट से हारी, सीमापुरी में आप जीती, कांग्रेस हारी, त्रिलोकपुरी में भी आप जीती और भाजपा प्रत्याशी हारा, वहीं बाबरपुर और घौंडा में भाजपा जीती और कांग्रेस हारी।
इन सीटों पर मुस्लिम मतदाता फैसला करने की स्थिति में हैं। यही वजह है कि कांग्रेस ऐसी सीटों पर अधिक जोर देना चाहती है। वहीं लोस चुनाव 2014 में मुस्लिम मतदाताओं ने झाड़ू का साथ दिया था। इसकी वजह से लोस परिणाम में सभी सात सीट पर आम आदमी पार्टी दूसरे नंबर पर रही और कांग्रेस के चार प्रत्याशियों कीे जमानत तक जब्त हो गई।
कांग्रेस का हाथ थामने वाले पार्षद आले मोहम्मद कहते हैं कि भाजपा को सिर्फ कांग्रेस रोक सकती है। यही संदेश आगामी विधानसभा चुनाव में मतदताओं के बीच लेकर आएंगे।
मुस्लिम मतदाताओं का इन सीटों पर हैं असर
ओखला, चांदनी चौक, सदर बाजार, बल्लीमारान, मटिया महल, करावल नगर, मुस्तफाबाद, सीलमपुर, सीमापुरी, घौंडा, त्रिलोकपुरी, कोंडली।