1984 में हुए सिख दंगों की भयावहता और वो रूह कपा देने वाले मंजर आपको दोबारा देखने को मिलेगी। घबराइए नहीं दोबारा ऐसे कोई दंगे नहीं होने जा रहे हैं। बल्कि सिख दंगों के 30 साल होने के मौके पर न्यूयॉर्क की थिएटर कंपनी ने दंगों के उस डर को 4 युवा पीड़ितों की कहानी के जरिए मंच पर दिखाना तय किया है।
इस नाटक का मंचन 30 व 31 अक्टूबर को बाबा खड़क सिंह मार्ग स्थित अक्षरा थियेटर और 1 नवंबर को मीराबाग स्थित सेंट मार्क्स गर्ल्स स्कूल में होगा। इस नाटक में केवल कलाकार एक्टिंग ही नहीं बल्कि इसके साथ-साथ कविता पाठ, चित्रकारी और संगीत भी पूरे नाटक को एक अलग प्रस्तुति देंगे।
यह नाटक पहली बार हारवर्ड यूनिवर्सिटी में 27 सितंबर को हुआ था। इसके बाद ये नाटक बोस्टन, न्यूजर्सी, न्यूयॉर्क, ओटावा, ब्रैंपटन और टोरंटो में भी हो चुका है।
सिख दंगों के साथ ही दिखाया जाएगा किशिनेव का नरसंहार
सरबप्रीत सिंह जो जे मेहर कौर के साथ इस नाटक का सह निर्देशन कर रहे हैं कहते हैं कि नाटक में दिखाए गए पात्र मीडिया में प्रकाशित खबरों में और संस्थाओं के रिसर्च पेपर में दिए गए विवरणों से लिया है। पर कोई भी पात्र पूरी तरह सत्य नहीं है।
दंगों के भयावह दृश्यों को इस नाटक के जरिए मंचित किया गया है। सरबप्रीत आगे कहते हैं कि ये नाटक कोई हल्का-फुल्का मनोरंजन करने वाला नाटक नहीं है बल्कि गंभीर नाटक है जिसके प्रति दर्शकों का रिएक्शन हमेशा गंभीर ही रहा है।
इस नाटक की शुरूआत सिख दंगों के 81 साल पहले 6 अप्रैल 1903 में रूस के बैसारेबिया में हुए ऐसे ही एक नरसंहार से शुरू होती है। इस नरसंहार में किशिनेव शहर के यहूदियों की जान गई थी।
अमेरिका के यहूदी कलाकार करेंगे नाटक का मंचन
इस नाटक की शुरूआत चित्रकला प्रदर्शनी और कविता पाठ से शुरू हुआ था, जिसमें किशिनेव नरसंहार जुड़ी चीजें दिखाई जाती थीं। इस नाटक को करने वाले न्यूयॉर्क के कुछ यहूदी कलाकार हैं।
शुरूआत में ये कलाकार केवल प्रदर्शनी और कविता पाठ की प्रस्तुति ही करते थे। धीरे-धीरे जब उन्होंने इस पर ज्यादा काम करना शुरू किया तो अलग-अलग क्षेत्रों के लोग इससे जुड़ते गए तब उन्हें कई ऐसे भुला दिए गए रक्तरंजित कहानियों का पता चला।
तब इस ग्रुप ने खोज करना शुरू किया जिसमें उन्हें सिखों के विरुद्ध दिल्ली में 1984 में हुए इस संगठित दंगे का पता चला। तब इस समूह ने यह निश्चय किया कि वो अपनी प्रदर्शनी में इस घटना को भी शामिल करेंगे।
नाटक के निर्देशक रह चुके हैं बिट्स पिलानी के छात्र
सरबप्रीत की दंगों पर लिखी कविताएं हैम नहमन बाइलिक की नरसंहार पर लिखी कविता से काफी मिलती जुलती है। सरबप्रीत की कविता का नाम कलतार्स माइम है। दोनों ही कविताओं में दृश्यांकन और भावों के इस्तेमाल भी काफी समान हैं।
सरबप्रीत का कहना है कि इस नाटक के शुरूआत में किशिनेव नरसंहार की घटना को लेने की वजह यही है कि नाटक यह दिखाता है कि पीड़ितों में कोई अंतर नहीं होता। चाहे वो किसी रंग या नस्ल के हों।
लगभग डेढ़ घंटे के इस प्ले में बोस्टन के कलाकारों ने काम किया है। सरबप्रीत जो दंगों के समय बिट्स पिलानी से ग्रैजुएशन कर रहे थे और उन्होंने दंगों के दौरान छपने वाली खबरों को भी पढ़ी था।
सरबप्रीत ने बताया कि इस प्ले में काम करने से पहले इन कलाकारों के कहानी के भाव और उस समय की स्थिति को आत्मसात करने के लिए काफी कड़ी मेहनत की है। सरबप्रीत अब बोस्टन में ही रहते हैं और टेक्नोलॉजी की फील्ड में उनका करियर है।
साभारः इंडियन एक्सप्रेस