स्वर्ण भारत परिवार के राष्ट्रीय अध्यक्ष पीयूष पंडित ने सरकार से जातिगत हिंसा फैलाने वाले कार्यक्रमों पर रोक लगाने की मांग की है। एक कार्यक्रम के दौरान पीयूष पंडित ने कहा कि पहले भी मनुस्मृति के दहन की खबरें मिलती रही हैं।
थोड़ा गहराई से समझें कि भारत में जातिवाद को बढ़ावा देने के लिए क्या केवल मनुस्मृति ही दोषी थी या अब है? कुछ समय पूर्व ही एक कोर्ट ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा था कि -''भारत ही ऐसा देश है जहां लोग स्वयं को पिछड़ा घोषित करने के लिए संघर्षरत हैं''। यानि इनका कथित उद्देश्य है वर्णव्यवस्था को ख़त्म करना और साथ ही स्वयं को निरंतर हीन और पिछड़ा मानना और उसे गाते रहना तो वर्तमान में ये संगठन और लोग स्वयं ही जातिवाद के सबसे बड़े पोषक क्यों नहीं समझे जाने चाहिए?
अगर वर्ण-व्यवस्था को ही ये जातिवाद कहते हैं तो फिर उसकी प्रथमाभिव्यक्ति तो वेद करते हैं। वह तो उपनिषदों में भी है। गीता में भी है। महाभारत में भी है। रामायण में भी है। इनके प्रति उदारता क्यों? दरअसल इसका कारण है कि इन सबको एक साथ जलाने की बात करें तो कई कट्टर हिंदूवादी पैदा होकर इनको ही जला देंगे, इसलिए बड़ी व्यवस्थित और धीमी प्रक्रिया के तहत मनुस्मृति के विरुद्ध दुष्प्रचार किया गया।
अगर ये इसे थोड़ा भी समझते तो समझ पाते कि यह कोई वाद मात्र नहीं है। यह एक प्रवाह है। भगवान शिव, श्री राम, कृष्ण सहित हमारे देवों के नाम को अगर मिटा सकते हो हिन्दुओं की स्मृति से तो ही इसे नष्ट करने का स्वप्न देखो। नष्ट करने का तो स्वप्न भी कोई महामूर्ख व्यक्ति ही देख सकता है।
लड़ते रहो स्वपरिभाषित.. स्वकल्पित नकली ब्राह्मणवाद से.. कोई फायदा नही इन सब बातों से.. इससे हिंसा और द्वेष ही फैलेगा, इसलिए सरकार को चाहिए कि ऐसे नकारात्मक और जातिगत द्वेष पैदा करने वाले कार्यक्रमों पर जल्द से जल्द रोक लगाएं।