अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किरायेदार के ‘पगड़ी’ के रूप में एकमुश्त राशि का भुगतान किए जाने मात्र से किरायेदारी स्थायी नहीं हो जाती। अदालत ने कहा कि ऐसी व्यवस्था मकान-मालिक और किरायेदार के बीच के कानूनी संबंध की प्रकृति नहीं बदलती और न ही इससे किरायेदार को हमेशा के लिए संपत्ति पर अधिकार मिल जाता है।
न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने एक किरायेदार की अपील खारिज करते हुए मकान-मालकिन के पक्ष में दिए गए बेदखली आदेश को बरकरार रखा। अदालत ने कहा कि संबंधित किराया समझौते में स्पष्ट रूप से यह प्रावधान था कि किसी भी पक्ष द्वारा दो महीने का नोटिस देकर किरायेदारी समाप्त की जा सकती है। इससे साफ है कि दोनों पक्षों ने इसे स्थायी किरायेदारी नहीं माना था।
मामला वर्ष 2001 में किराये पर दी गई एक दुकान से जुड़ा है। किरायेदार का दावा था कि उसने मकान-मालकिन को पगड़ी के रूप में 1.48 लाख रुपये दिए थे और इसी आधार पर उसकी किरायेदारी स्थायी हो गई थी। उसने एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) का भी हवाला दिया। हालांकि, हाई कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया और कहा कि पगड़ी का भुगतान किरायेदारी को समाप्त न होने वाला अधिकार नहीं बनाता। इसी आधार पर अदालत ने अपील खारिज कर दी।