चिरागे नीम शब खुरशेद को भी नाम धरता है। अजब हैवान मुतलिक के मेरा अपमान करता है। हमशरी करता है तलवार से खंजर होकर। ब्रतरी का तुम्हें दावा हुआ कमतर होकर।
जर से बेजार तुम झार की पत्ती होकर। साथ सोने के तौलते हैं तुम रत्ती होकर। यह पंक्तियां सुनने में थोड़ा सी अटपटी लग सकती हैं, लेकिन रामलीला के उर्दू भाषा के इन संवादों के श्रोता दीवाने हैं।
पाकिस्तान के डीजी खान शहर में उर्दू भाषा में होने वाली रामलीला की परंपरा अब भी फरीदाबाद के सेक्टर-15 स्थित श्रद्धा रामलीला कमेटी में कायम है। वर्ष 1947 में भारत पाकिस्तान के बंटवारे के बाद बड़ी संख्या में पाकिस्तान से भाग कर लोग दिल्ली एवं फरीदाबाद के आसपास पहुंचे थे।
तब से वहां की उर्दू रामलीला की परंपरा को पीढ़ी दर पीढ़ी कायम रखने का काम किया जा रहा है। युवा वर्ग को उर्दू भाषा से जोड़ने के लिए रामलीला का संवाद हर वर्ष इस भाषा में किया जाता है। समय के साथ रामलीला के संवाद में थोड़ा बहुत परिवर्तन किया गया ताकि हिंदी भाषी क्षेत्र के लोगों को शामिल किया जा सके।
इस उर्दू भाषा में हिंदी के शब्द को शामिल कर रामलीला के संवाद को सरल किया गया है। क्या कहूं राज ए दिल कहना महज बेकार है, पहल है सुनना मगर चलना बहुत दुश्वार है। क्या किसी ने बदजुबानी की तुम्हारी शान में, कुछ कमी बाकी हुई क्या ऐश और आराम में।
उर्दू भाषा में होने वाली रामलीला को सुनने के लिए बड़ी संख्या में मुस्लिम लोग भी शामिल रहते हैं। यह रामलीला हिंदू मुस्लिम एकता का परिचय देने के साथ सामाजिक सौहार्द का संदेश दे रही है।
इस रामलीला को देखने के लिए दिल्ली एनसीआर से लोग पहुंचते हैं। श्रद्धा रामलीला के सदस्य अनिल चावला कहते हैं कि पाकिस्तान के डीजी खान जिसे डेरागाजी खान भी कहते हैं। यहां पर 1947 से पूर्व उर्दू भाषा में होने वाली रामलीला का काफी क्रेज था।
इस क्रेज को हर वर्ग के बीच बनाए रखने के लिए अब हर वर्ष रामलीला का मंचन उर्दू भाषा में किया जा रहा है। इससे पूर्व पलवल में उर्दू भाषा वाली रामलीला शुरू की गई उसके बाद यहां पिछले नौ सालों से लगातार की जा रही है। इसके संवाद को बेहतर बनाने के लिए यशवंत की चौपाइयां, राधेश्याम की चौपाइयां एवं गोस्वामी तुलसीदास की चौपाइयों को शामिल किया गया है।