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राष्ट्रद्रोह के आरोपियों के पोस्टर लहराने पर बंटी किसानों की राय, अध्यात्मिक गुरु भी मैदान में

Sat, 12 Dec 2020 05:35 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
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किसान आंदोलन - फोटो : amar ujala
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राजधानी की सीमाओं पर लगातार 16वें दिन डटे किसानों ने कहा कि केंद्र सरकार की नीतियों के विरोध और किसान आंदोलन के समर्थन में जो भी आएगा वे उन सभी का स्वागत करेंगे। भले ही वह भाजपा के लोग ही क्यों न हों। हालांकि, टीकरी बार्डर पर राष्ट्रद्रोह का आरोप झेल रहे लोगों के समर्थन में पोस्टर लहराए जाने पर प्रतिक्रिया मिलीजुली रही। टीकरी और सिंघु बार्डर पर कई किसानों ने इसका समर्थन किया, जबकि गाजीपुर और चिल्ला बॉर्डर पर किसानों ने इस तरह की गतिविधियों पर एतराज जताते हुए इसे सरकार की चाल करार दे दिया।

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दरअसल, बीते दिनों सीएए एनआरसी के खिलाफ देशभर में जारी संघर्षों में संदिग्ध हालत में लिप्त रहे शरजील इमाम, उमर खालिद, खालिद सैफी, सिफा उर रहमान जैसे तमाम दूसरे लोगों पर केंद्र सरकार और देश की तमाम जांच एजेंसियों द्वारा की गई कार्रवाई के खिलाफ बृहस्पतिवार को भारतीय किसान यूनियन (उगरान) के कार्यकर्ताओं ने टीकरी बॉर्डर पर प्रदर्शन किया था। उनके पोस्टर भी लहराए गए थे। इस पर आम किसानों की राय बंटी हुई है।

किसानों ने कहा...
किसानों ने सरकार के सामने अपनी बात रख दी है। अब सरकार को उस पर गौर करना है, लेकिन किसानों के इस संघर्ष में यदि कोई शरीक होता है तो उसका स्वागत है।
- सुखदेव सिंह, पटियाला

चाहे सीएए के समर्थन वाले लोग हों या फिर किसी दूसरे संगठन के, यहां कोई भी आकर अपना समर्थन दे सकता है। उन लोगों के साथ भी सरकार ने अन्याय किया है। केंद्र सरकार किसी की
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बात सुनना नहीं चाहती है। - गुरपिंदर सिंह, पटियाला

जब लोगों का दुख एक जैसा है तो उनके समर्थन में क्या खराबी है। केंद्र से जिसे भी शिकायत है वह किसान आंदोलन में शामिल हो सकते हैं। उनका स्वागत किया जाएगा। - सुरजीत सिंह
नोनीवाल, संगरूर

उगरान समेत दिल्ली की सीमाओं पर डटे सभी संगठन एक साथ हैं। फिर उनके समर्थन या विरोध का कोई सवाल ही नहीं खड़ा होता। सरकार को यदि जल्द समझ में नहीं आया तो ना जाने
कौन-कौन से गड़े मुर्दे उखड़कर सामने आ जाएंगे। - जगसीर सिंह, भटिंडा

यह आरएसएस वालों की चाल है। इस तरह की पोस्टरबाजी कर वह संगठन को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। किसान अपनी मांग को लेकर आए हैं और उन्हें अन्य किसी भी मसलों से कोई
लेना-देना नहीं है। - राजेंद्र सिंह, गाजियाबाद

हम सिंघु और टीकरी बॉर्डर पर मौजूद किसानों का समर्थन देने आए हैं। सरकार और किसानों के बीच सहमति बनने के बाद पहले उन बॉर्डरों पर बैठे किसान उठेंगे तब हम लोग यहां से घर
जाएंगे। किसान किसी भी राजनीतिक पार्टी या फिर अपने मकसद से आंदोलन में शामिल संगठन का समर्थन नहीं ले रहे हैं। - महेंद्र सिंह, मोदीनगर

-जो पार्टी अपनी सत्तारूढ़ हैं वह हर किसी मसले को दबाने के लिए दूसरा मसला उछाल देती हैं। पोस्टरबाजी केंद्र की रणनीति का हिस्सा है। इससे किसान का कोई लेना-देना नहीं है। सरकार
किसान को मजदूर बनाने में जुटी है, जो किसी भी हालत में स्वीकार नहीं है।  - प्रमोद सिंह, मेरठ
 

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अध्यात्मिक गुरुओं ने किया आंदोलन का रुख

किसानों के रुख को देखते हुए अब अध्यात्मिक गुरुओं का भी आंदोलन स्थल पर पहुंचने का सिलसिला तेज हो गया है। किसानों के समर्थन में धर्म गुरुओं के पहुंचने से आंदोलन को नई दिशा मिल सकती है। गुरुओं का कहना है कि उनका किसी भी राजनीतिक पार्टी से लेना-देना नहीं है। सिर्फ कोशिश यह है कि केंद्र सरकार और किसानों के बीच 16 दिनों से चल रहे गतिरोध का जल्द समाधान निकले।

गेरुआ वस्त्र में सिंघु बॉर्डर पर पहुंचने वाले धर्म गुरुओं का कहना है कि किसानों को आजादी के बाद से अधिकार मिलने का इंतजार है। स्वामी नित्यानंद ने कहा कि किसान अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उनके हितों की रक्षा करने का दायित्व सरकार का है। सरकार की ओर से इस मामले में प्रस्ताव भेजे जा रहे हैं, लेकिन किसानों की मांग कानून रद्द करने की है। 

कैदियों को अध्यात्म का गुर सिखाने वाले स्वामी हर्षानंद ने कहा कि अगर यह आंदोलन सरकार के खिलाफ होता तो 24 घंटे में निराकरण हो जाता। उन्होंने भी किसानों का समर्थन करते हुए कहा कि उनके हितों की अनदेखी नहीं होनी चाहिए। पहले भी सरकारों ने अन्नदाताओं के हितों की रक्षा नहीं की। अभी दोनों पक्षों के बीच इस मामले में सहमति नहीं बन सकी है, लेकिन इसके जल्द से जल्द समाधान के लिए कदम बढ़ाया जाना चाहिए। इस वजह से आम लोगों की मुश्किलें बनी हुई और अर्थव्यवस्था पर भी इसका असर पड़ने लगा है।
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